तराई पश्चिमी डिवीजन में ‘सीड बॉल तकनीक’ लागू करने की तैयारी, जंगलों में हरियाली बढ़ाने का सस्ता और असरदार तरीका
सलीम अहमद साहिल
तराई पश्चिमी फॉरेस्ट डिवीजन अब जंगलों में घास और चारा बढ़ाने के लिए पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहने की बजाय आधुनिक और किफायती सीड बॉल तकनीक (Seed Ball Method) लागू करने की तैयारी कर रहा है। यह तकनीक अभी इस्तेमाल नहीं हो रही है, लेकिन फॉरेस्ट अधिकारियों ने इसके फायदे और व्यवहारिकता को देखते हुए इसे आगामी महीनों में शुरू करने का प्लान बनाया है। बताया जा रहा है कि इस प्रक्रिया से न केवल जंगलों में प्राकृतिक घास की बहाली तेज होगी, बल्कि सरकारी राजस्व की बचत, मजदूरों पर निर्भरता में कमी और बड़े इलाकों को कम समय में हराभरा करने का लक्ष्य भी पूरा होगा।
सीड बॉल तकनीक एक ऐसी विधि है जिसमें घास या पौधों के बीजों को मिट्टी, गोबर और जैविक खाद से बनी छोटी गोलियों में सुरक्षित बंद कर दिया जाता है और फिर इन गोलियों को जंगलों या खाली पड़ी जमीन पर फेंक दिया जाता है। बारिश या नमी पड़ने पर यह गोलियाँ खुद-ब-खुद गल जाती हैं और बीज जमीन में जड़ पकड़कर घास में बदल जाते हैं, जिससे बिना खुदाई, बिना रोपाई और बिना भारी मानवबल के बड़े क्षेत्र में प्राकृतिक हरियाली विकसित हो जाती है। तराई पश्चिमी डिवीजन के कई रेंजों में घास के मैदान कम हो रहे हैं, वनाग्नि और मिट्टी कटाव की समस्या बढ़ी है, जबकि कई इलाके ऐसे हैं जहाँ मजदूरों का पहुँचना मुश्किल है। ऐसे में यह तकनीक सबसे सस्ती, आसान और प्रभावी विकल्प मानी जा रही है क्योंकि इससे हजारों बीज एक साथ सुरक्षित रूप से जमीन में पहुँच जाते हैं और प्राकृतिक पुनर्जनन भी तेज हो जाता है।
फॉरेस्ट विभाग का मानना है कि यदि सीड बॉल तकनीक को प्लांटेशन सीजन में अपनाया गया तो उससे सरकारी खर्च में बड़ी कटौती संभव है क्योंकि मजदूरों को बड़े स्तर पर मैदान तैयार करने, खुदाई करने, पौधे लगाने या पानी पहुंचाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सिर्फ बीज तैयार करके निर्धारित क्षेत्रों में फैलाने भर से मिट्टी को कसने, ढलानों को स्थिर करने और वन्यजीव चारे की उपलब्धता बढ़ाने जैसे कई लक्ष्य एक साथ पूरे होंगे। इसके साथ-साथ यह तकनीक उन क्षेत्रों के लिए भी कारगर मानी जा रही है जहाँ घना जंगल, दलदली जमीन, नदी किनारे या कठिन पहाड़ी ढलान होने के कारण किसी भी प्रकार का मैनुअल वर्क संभव नहीं है।
तराई पश्चिमी डिवीजन में इस विधि को अपनाने से वन्यजीवों के लिए चारा उपलब्धता में सुधार होगा, मिट्टी कटाव रुकेगा, जंगल की खाली पड़ी जमीन तेजी से हरी होगी और आग से प्रभावित क्षेत्रों का प्राकृतिक पुनरुद्धार भी तेज गति से होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया न केवल पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित है, बल्कि आधुनिक वन प्रबंधन में इसे विश्व स्तर पर सबसे सफल प्राकृतिक रीजनरेशन तकनीकों में से एक माना जाता है।
फॉरेस्ट विभाग के अनुसार, यदि यह मॉडल सफल रहता है तो इसे आगे चलकर पूरे तराई क्षेत्र में विस्तारित किया जा सकता है, जिससे बड़े हिस्से में हरियाली बढ़ने के साथ-साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में भी मदद मिलेगी क्योंकि घास की कमी वन्यजीवों के गांवों की ओर बढ़ने का एक बड़ा कारण मानी जाती है। विभाग का यह भी कहना है कि आने वाले समय में यदि स्थानीय ग्रामीणों और स्कूलों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ा गया तो इससे पर्यावरण संरक्षण की सामुदायिक भागीदारी भी बढ़ेगी और जंगलों की सेहत में बड़ा सुधार देखा जा सकेगा।