सफेद कोट के पीछे का काला सच: बरेली के चर्चित नेफ्रोलोजी डॉ. नितिन शर्मा के पंजीकरण पर उठे सवाल, रजिस्ट्रेशन से पहले इलाज का खेल, परत दर परत खुलासा!!
ब्यूरो रिपोर्ट: शानू कुमार, बरेली (उत्तर प्रदेश)
बरेली: उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद में चिकित्सा जगत की साख को बट्टा लगाने वाला एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग से लेकर आम जनता तक के होश उड़ा दिए हैं। शहर के नामी ‘विनायक हॉस्पिटल’ में सेवाएं देने वाले चर्चित नेफ्रोलोजी डॉ. नितिन शर्मा की कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगलियां उठी हैं। आरोप है कि डॉक्टर साहब ने यूपी मेडिकल काउंसिल से आधिकारिक पंजीकरण (Registration) मिलने से काफी पहले ही मरीजों की जान से खेलना शुरू कर दिया था।
कानून की आंखों में धूल और ‘रजिस्ट्रेशन’ का रहस्य
मेडिकल काउंसिल के नियमों के मुताबिक, बिना वैध पंजीकरण के प्रैक्टिस करना गैर-कानूनी है। लेकिन सूत्रों का दावा है कि डॉ. नितिन शर्मा ने इन नियमों को ठेंगे पर रखकर विनायक हॉस्पिटल के ओपीडी और वार्डों में ‘अघोषित’ रूप से मरीजों का इलाज किया। बड़ा सवाल यह है कि विनायक हॉस्पिटल जैसे बड़े संस्थान ने किस मजबूरी या लालच में एक ऐसे डॉक्टर को स्टेथोस्कोप थमा दिया, जिसके पास प्रैक्टिस करने की कानूनी वैधता ही नहीं थी? क्या यह सारा खेल किसी और डॉक्टर के रजिस्ट्रेशन नंबर की आड़ में खेला जा रहा था?
आयुष्मान योजना: गरीबों के हक पर डाका?
मामले की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब इसमें केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘आयुष्मान भारत’ योजना का जिक्र आता है। अंदेशा जताया जा रहा है कि अपंजीकृत होने के बावजूद डॉ. शर्मा और संबंधित अस्पतालों ने सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए कागजी हेराफेरी की। गरीबों के इलाज के नाम पर क्या सरकारी धन का बंदरबांट किया गया? यह जांच का सबसे बड़ा बिंदु है। चर्चा है कि रसूखदार पहुंच के कारण अब तक इस सच को दबाए रखा गया, लेकिन अब परतें उखड़नी शुरू हो गई हैं।
जिम्मेदारों की ‘रहस्यमयी’ चुप्पी
जब इस गंभीर मामले की सच्चाई जानने के लिए डिप्टी सीएमओ डॉ. लईक अहमद से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कैमरे और सवालों से दूरी बना ली। जिले के स्वास्थ्य अधिकारियों की यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या स्वास्थ्य महकमा भी इस ‘डॉक्टर के खेल’ में मौन सहमति दे रहा था?
जल्द होगा बड़ा खुलासा
सूत्रों की मानें तो डॉ. शर्मा के खिलाफ दस्तावेजी सुबूत जुटा लिए गए हैं। जल्द ही उन कागजों को सार्वजनिक किया जाएगा जो यह साबित करेंगे कि किस तारीख को रजिस्ट्रेशन मिला और उससे पहले कितने मरीजों को ‘इलाज’ के नाम पर छला गया। इस ‘फर्जीवाड़े’ के खुलासे के बाद अब बरेली के चिकित्सा जगत में ‘रगड़ाई’ शुरू होना तय है।