डॉक्टरों के ‘संगठन’ की आड़ में पत्रकार को ‘ट्रैप’ करने की साजिश? फोन कर अस्पताल बुलाया, फिर गुट बनाकर संपादक से की अभद्रता! डॉ. फाजिल और साथियों की दबंगई

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डॉक्टरों के ‘संगठन’ की आड़ में पत्रकार को ‘ट्रैप’ करने की साजिश? फोन कर अस्पताल बुलाया, फिर गुट बनाकर संपादक से की अभद्रता! डॉ. फाजिल और साथियों की दबंगई!

शानू कुमार ब्यूरो उत्तर प्रदेश

 

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बरेली : जनपद के पीलीभीत बाईपास रोड पर स्थित एक आलीशान अस्पताल की चमक-धमक वाली बिल्डिंग के पीछे क्या कोई गहरा काला राज छिपा है? ‘लावा न्यूज’ के संपादक कामरान अली के साथ हुई अभद्रता ने जिले के चिकित्सा जगत को झकझोर कर रख दिया है। यह मामला अब महज बदतमीजी का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘ट्रैप’ (जाल) का नजर आ रहा है, जिसमें एक पत्रकार को ‘सम्मान और बातचीत’ का झांसा देकर बुलाना और फिर घेरकर अपमानित करना एक गहरी साजिश की ओर इशारा करता है

 

 

साजिश का ‘क्रोनोलॉजी’ समझिए: पहले बुलाया, फिर घेरा!विश्वसनीय सूत्रों और घटनाक्रम के अनुसार, यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। इस पूरे विवाद में ‘प्लानिंग’ की बू आ रही है:

फोन कॉल का झांसा: सबसे पहले अस्पताल के मालिक डॉ. फाजिल मंसूरी ने खुद फोन करके संपादक कामरान अली को अस्पताल बुलाया। बातचीत का लहजा ऐसा था मानो कोई बहुत जरूरी और सम्मानजनक चर्चा होनी हो।

 

सुनियोजित घेराबंदी: जैसे ही संपादक अस्पताल पहुंचे, वहां तैयार थी पत्रकार का ‘मानसिक शिकार’ करने के लिए पूरी फील्डिंग जो पहले से सजाई गई थी।

अभद्रता का तांडव: बंद कमरे में एक अकेले पत्रकार को बुलाकर उसके साथ अभद्रता करना और रसूख की धौंस देना यह साबित करता है कि यह डॉक्टरों की टोली नहीं, बल्कि किसी ‘सिंडिकेट’ की तरह काम कर रहे थे।

गंभीर सवाल: आखिर ‘डॉक्टरों’ को किस बात का डर है?

अस्पताल प्रबंधन की इस हरकत ने कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब प्रशासन को तलाशना होगा:

सवाल 1: अगर अस्पताल के सभी मानक (Standards) पूरे हैं, तो पत्रकार के सवालों से इतनी घबराहट क्यों? क्या आलीशान दीवारों के पीछे ‘बिना डिग्री वाला स्टाफ’ और ‘अवैध लैब’ का काला साम्राज्य चल रहा है?

सवाल 2: डॉ. फाजिल मंसूरी ने खुद फोन करके क्यों बुलाया? क्या वह संपादक को किसी तरह के दबाव में लेना चाहते थे या फिर उन्हें डराने-धमकाने के लिए जाल बिछाया गया था?

सवाल 3: क्या पीलीभीत बाईपास के इस अस्पताल में स्टाफ का व्यवहार मरीजों के साथ भी ऐसा ही है? क्या रसूख के दम पर यहां मरीजों की आवाज भी दबा दी जाती है?

 

‘मित्रता’ का ढोंग और हकीकत का सामना

 

डॉ. फाजिल मंसूरी अब इस मामले को ‘मित्रता और निजी मुलाकात’ का नाम देकर दबाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या अब बरेली में ‘मित्रता’ का मतलब बुलाकर अपमानित करना हो गया है? यह दलील सिर्फ एक कमजोर बचाव है ताकि स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की कार्रवाई से बचा जा सके।

 

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

शहर के एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्र के संपादक के साथ इस तरह की योजनाबद्ध बदतमीजी होने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग का शांत रहना चौंकाने वाला है। क्या स्वास्थ्य विभाग को इस अस्पताल की एनओसी (NOC), बिल्डिंग मानकों और अवैध पैथोलॉजी की जांच करने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार है?

 

 

पत्रकार जगत में उबाल: “कलम झुकेगी नहीं”

कामरान अली का स्पष्ट कहना है कि रसूखदारों की धमकियों से सच दबने वाला नहीं है। अस्पताल की ऊंची इमारतें और सफेद कोट के पीछे छिपे काले कारनामे जल्द ही बेनकाब होंगे। पत्रकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसे ‘सफेदपोश गुंडों’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो आंदोलन की राह अपनाई जाएगी।

 

 

बड़ा सवाल: क्या बरेली का स्वास्थ्य महकमा इन ‘खास’ डॉक्टरों के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेकर इनके अस्पताल की असलियत जनता के सामने लाएगा?

 

 

 

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