उत्तराखंड हाईकोर्ट का सख्त रुख: सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए ‘टेक्नोलॉजी’ और ‘पारदर्शी पोर्टल’ पर मांगी रिपोर्ट
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश में राजकीय राजमार्गों, वन भूमि और राजस्व भूमि पर बढ़ते अवैध अतिक्रमण के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभागों को कड़े निर्देश जारी किए हैं।
तकनीक के इस्तेमाल पर जवाब तलब
कोर्ट ने गृह सचिव सहित सभी विभागों के सचिवों से पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के क्रम में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण की पहचान करने के लिए टेक्नोलॉजी (जैसे सैटेलाइट मैपिंग या ड्रोन) का उपयोग किस तरह किया जा रहा है। कोर्ट ने इस संबंध में 8 जनवरी 2026 तक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के ‘पारदर्शी पोर्टल’ का हवाला
सुनवाई के दौरान कुछ पक्षों ने शिकायत की कि बिना किसी पूर्व नोटिस या सुनवाई के अतिक्रमण तोड़ा जा रहा है। इस पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के उस महत्वपूर्ण आदेश का जिक्र किया, जिसमें अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए एक ‘पारदर्शी पोर्टल’ बनाने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए ताकि किसी के अधिकारों का हनन न हो।
यह मामला तब शुरू हुआ जब दिल्ली निवासी एक व्यक्ति ने हाईकोर्ट के न्यायाधीश को पत्र लिखकर नैनीताल के पदमपुरी में अधिकारियों की मिलीभगत से हुए अतिक्रमण की शिकायत की थी। कोर्ट ने इस पत्र को जनहित याचिका (PIL) के रूप में स्वीकार किया और इसका दायरा बढ़ाते हुए पूरे प्रदेश को इसमें शामिल कर लिया।
मुख्य निर्देश एक नजर में:
सभी जिलाधिकारियों (DM) और डीएफओ (DFO) को अपने क्षेत्रों में अतिक्रमण चिन्हित कर रिपोर्ट पेश करने के आदेश।
राष्ट्रीय राजमार्ग, राजकीय मार्ग, वन और राजस्व भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने का लक्ष्य।
अगली सुनवाई की तिथि 8 जनवरी 2026 नियत की गई है।