कर्तव्य की राह पर ‘रक्षक’ हुए प्रताड़ित: उजिटिया में रस्सियों से जकड़ी गई कानून की मर्यादा, आखिर कब थमेगा रक्षकों पर वार?

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कर्तव्य की राह पर ‘रक्षक’ हुए प्रताड़ित: उजिटिया में रस्सियों से जकड़ी गई कानून की मर्यादा, आखिर कब थमेगा रक्षकों पर वार?

अज़हर मलिक 

चमोली : जनपद के उजिटिया गांव में बुधवार को एक ऐसी हृदयविदारक और चिंताजनक घटना घटी जिसने रक्षक और सुरक्षित समाज के बीच के विश्वास को हिलाकर रख दिया है। वन्यजीवों और वनों की सुरक्षा में अपनी जान की बाजी लगाने वाले वन विभाग के कर्मियों को ग्रामीणों के अकारण और अनियंत्रित गुस्से का शिकार होना पड़ा।

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एक ओर जहाँ गुलदार के आतंक से ग्रामीण भयभीत थे, वहीं दूसरी ओर सूचना मिलते ही मौके पर पहुँचे एक फॉरेस्टर सहित छह वन कर्मियों को ग्रामीणों ने अपराधियों की तरह रस्सियों से बांधकर करीब दो घंटे तक बंधक बनाए रखा। यह घटना केवल विभाग के कर्मचारियों का अपमान नहीं है, बल्कि सरकारी सेवा में तैनात उन रक्षकों के मनोबल पर गहरा प्रहार है जो विषम परिस्थितियों में भी जनता की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। हालांकि ग्रामीणों का आक्रोश मवेशियों की हानि को लेकर था, लेकिन कानून को हाथ में लेकर वर्दीधारी कर्मचारियों को बंधक बनाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है।

 

 

 

वन विभाग के ये कर्मचारी विभाग के कड़े नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत कार्य करते हैं, जहाँ पिंजरा लगाने या वन्यजीव को पकड़ने के लिए उच्चाधिकारियों की अनुमति अनिवार्य होती है, मगर भीड़ के उन्माद ने इन तकनीकी प्रक्रियाओं को समझने के बजाय रक्षकों को ही प्रताड़ित करना बेहतर समझा। अल्मोड़ा से तुलना कर विभाग पर टालमटोल का आरोप लगाना तर्कहीन प्रतीत होता है क्योंकि हर क्षेत्र की परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं और विभाग अपनी पूरी क्षमता से कार्य कर रहा है। जिला पंचायत सदस्य और वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद ही इन निहत्थे कर्मचारियों को रिहा किया गया,

 

 

लेकिन यह सवाल आज भी खड़ा है कि यदि रक्षक ही सुरक्षित नहीं रहेंगे और जनता इसी तरह कानून को हाथ में लेती रहेगी, तो वनों और वन्यजीवों के बीच बसे गांवों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा। विभाग ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पिंजरा लगाने का निर्णय लिया है, परंतु कर्मचारियों के साथ हुआ यह अभद्र व्यवहार लंबे समय तक विभाग के गलियारों में चर्चा का विषय बना रहेगा।

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