साहब! जांच रिपोर्ट कहां है? बहेड़ी नताशा अल्ट्रासाउंड प्रकरण में मरीज की जान से खिलवाड़ करने वाले रसूखदारों को किसका संरक्षण? पीड़ित को इंतजार सिर्फ कार्रवाई का!!

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साहब! जांच रिपोर्ट कहां है? बहेड़ी नताशा अल्ट्रासाउंड प्रकरण में मरीज की जान से खिलवाड़ करने वाले रसूखदारों को किसका संरक्षण? पीड़ित को इंतजार सिर्फ कार्रवाई का!!

शानू कुमार ब्यूरो उत्तर प्रदेश

बरेली के बहेड़ी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर खिलवाड़ का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है, जहाँ एक डायग्नोस्टिक सेंटर की गलत रिपोर्ट और उसके बाद हुए त्रुटिपूर्ण उपचार ने मरीज अयाज खान की जान जोखिम में डाल दी।

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इस पूरे प्रकरण की शुरुआत 03 दिसंबर 2025 को हुई, जब लोधीपुर चौराहा स्थित डा. नताशा अल्ट्रासाउंड एंड डायग्नोस्टिक सेंटर पर मरीज का अल्ट्रासाउंड कराया गया, जिसमें कथित तौर पर बीमारी की सही स्थिति और पथरी का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। इसी गलत रिपोर्ट को आधार मानकर बहेड़ी में डा. जहीर द्वारा मरीज का इलाज शुरू किया गया और पेशाब की नली डाली गई, जिससे मरीज की तकलीफ कम होने के बजाय बढ़ती चली गई। स्थिति तब और अधिक भयावह हो गई जब मरीज को यूनिटी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ कथित रूप से गलत तरीके से कैथेटर डालने के कारण मरीज के अंगों से रक्तस्राव शुरू हो गया और उसकी हालत मरणासन्न हो गई।

 

 

 

 

आनन-फानन में परिजनों ने मरीज को बरेली के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ लैंडमार्क अल्ट्रासाउंड सेंटर की जांच में 8.8 मिमी की पथरी की पुष्टि हुई और तत्काल ऑपरेशन कर मरीज की जान बचाई गई। परिजनों का सीधा आरोप है कि यदि डा. नताशा अल्ट्रासाउंड सेंटर ने पहली बार में सही रिपोर्ट दी होती, तो मरीज को न तो गलत इलाज मिलता और न ही उसे इस जानलेवा शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता। इस घोर लापरवाही को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी एवं पीसीपीएनडीटी नोडल अधिकारी डा. लईक अहमद अंसारी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय जांच पैनल गठित किया,

 

 

जिसमें जिला चिकित्सालय के रेडियोलॉजिस्ट डा. राजीव रंजन को भी शामिल किया गया। हैरानी की बात यह है कि बीते 26 दिसंबर को सभी संबंधित पक्षों को साक्ष्यों सहित तलब किए जाने के बावजूद आज तक जांच रिपोर्ट का कोई अता-पता नहीं है। विभाग की यह रहस्यमयी चुप्पी न केवल दोषियों को संरक्षण देने का संकेत दे रही है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर रही है कि आम आदमी की जान की कीमत इन रसूखदार सेंटरों के आगे कुछ भी नहीं है। सवाल यह उठता है कि आखिर किसकी शह पर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाला गया है और क्या भविष्य में किसी अन्य मरीज की जान जाने का इंतजार किया जा रहा है? पीड़ित परिवार आज भी न्याय की गुहार लगा रहा है, लेकिन जांच पैनल की फाइलों में कैद सन्नाटा जिले की स्वास्थ्य सेवाओं की पारदर्शिता पर एक काला धब्बा साबित हो रहा है।

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