तीन साल से मौत और जिंदगी के बीच जूझ रहा बेटा: मुफ़लिसी से टूटा परिवार, बेबस मां ने सरकार और समाजसेवियों से लगाई मदद की गुहार

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तीन साल से मौत और जिंदगी के बीच जूझ रहा बेटा: मुफ़लिसी से टूटा परिवार, बेबस मां ने सरकार और समाजसेवियों से लगाई मदद की गुहार

लालकुआँ। लालकुआँ कोतवाली क्षेत्र के खड्डी मोहल्ला निवासी 32 वर्षीय रवि कुमार पिछले तीन साल से लकवे सहित कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है, जिससे उसका पूरा परिवार आज दाने-दाने को मोहताज हो गया है। डॉक्टरों ने रवि के सिर का बड़ा ऑपरेशन अनिवार्य बताया है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण परिवार के पास इलाज तो क्या, दवा खरीदने तक के पैसे नहीं बचे हैं। मजबूर मां-बाप अपने इकलौते बेटे की जान बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हैं, क्योंकि बीमारी ने न केवल रवि के शरीर को बल्कि इस परिवार की आर्थिक रीढ़ को भी पूरी तरह तोड़ दिया है। घटनाक्रम के अनुसार, 15 सितंबर 2023 को रवि अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ा था, जिसके बाद उसे बेस अस्पताल हल्द्वानी और फिर सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। करीब एक महीने तक चले गहन उपचार के बाद भी जब सुधार नहीं हुआ, तो उसे घर भेज दिया गया। इसके बाद परिवार रवि को लेकर हल्द्वानी से दिल्ली तक के अस्पतालों में भटकता रहा, लेकिन गरीबी के कारण कहीं भी स्थायी समाधान नहीं मिल सका। इस संघर्ष के दौरान रवि के पिता का रोजगार भी छिन गया, जिससे घर की स्थिति और भी बदतर हो गई।

रवि की मां सुशीला देवी ने अत्यंत भावुक होकर बताया कि लाखों रुपये इलाज में खर्च करने के बाद अब वे पूरी तरह असहाय हो चुके हैं। उन्होंने रोते हुए कहा कि उनका बेटा न तो बैठ पा रहा है, न चल पा रहा है और न ही बोल पाने की स्थिति में है। डॉक्टरों के अनुसार सिर का ऑपरेशन ही उसकी जिंदगी बचा सकता है, लेकिन अब उनकी उम्मीदें केवल सरकारी मदद और समाजसेवियों की दया पर टिकी हैं। परिवार का दर्द इतना गहरा है कि घर की बदहाली के कारण पूरा परिवार ठंडी रातें एक ही बिस्तर पर गुजारने को मजबूर है। मां का कहना है कि उन्होंने जनप्रतिनिधियों और नेताओं से भी मदद की गुहार लगाई, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासनों के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ। अब यह टूटता हुआ परिवार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, स्थानीय प्रशासन और सक्षम समाजसेवियों की ओर टकटकी लगाए बैठा है। यह मामला न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है जहाँ जीवन और मौत का फैसला आर्थिक स्थिति से तय होता है। अब समाज की सामूहिक मदद ही रवि को जिंदगी का दूसरा मौका दे सकती है।

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