बेशर्म हुआ बरेली का स्वास्थ्य विभाग: मैक्सालाइफ हॉस्पिटल के ‘धोखाधड़ी’ वाले खेल पर कार्रवाई के बजाय मेहरबानी, डिप्टी सीएमओ डॉ. लईक के ‘कथित’ संरक्षण ने बचाई अस्पताल की गर्दन
शानू कुमार ब्यूरो उत्तर
बरेली: शहर का स्वास्थ्य महकमा इन दिनों भ्रष्टाचार और अपनों को उपकृत करने के आरोपों से बुरी तरह घिरा नजर आ रहा है, जहाँ मैक्सालाइफ सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल की गंभीर अनियमितताओं पर पर्दा डालने के लिए ‘शर्मनाक’ टालमटोल का खेल खेला जा रहा है। लंबे समय तक दो अलग-अलग नामों से अस्पताल चलाकर आम जनता की आंखों में धूल झोंकने वाले इस अस्पताल पर नियमों के तहत ताला लटकना चाहिए था, लेकिन विडंबना देखिए कि जिम्मेदार अधिकारियों ने वैधानिक कार्रवाई करने के बजाय इसे संरक्षण देने की जैसे कसम खा रखी है।
जैसे ही यह जालसाजी मीडिया के माध्यम से बेनकाब हुई, अस्पताल प्रबंधन ने आनन-फानन में महज बोर्ड बदलकर अपनी गलती सुधारने का स्वांग रचा, पर सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ बोर्ड बदल देने से महीनों तक की गई कानूनी धोखाधड़ी और मरीजों के साथ हुआ खिलवाड़ माफ किया जा सकता है? इस पूरे प्रकरण में स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी और डिप्टी सीएमओ डॉ. लईक अहमद की संदेहास्पद चुप्पी विभाग की मंशा पर गहरे सवाल खड़े कर रही है। चर्चाओं का बाजार गर्म है कि मैक्सालाइफ से जुड़े डॉक्टर अनीस बेग की डिप्टी सीएमओ स्तर पर गहरी पैठ और कथित नजदीकी के चलते ही कार्रवाई की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
कायदे से जिस अस्पताल का नाम पंजीकरण दस्तावेजों से अलग हो, उस पर भारी जुर्माना, लाइसेंस की समीक्षा और तत्काल प्रभाव से स्पष्टीकरण की कार्रवाई होनी चाहिए थी, लेकिन यहाँ तो ‘भ्रष्ट तंत्र’ के चलते जांच की आंच पहुँचने से पहले ही रसूख का पानी डाल दिया गया। आखिर कब तक रसूखदारों को बचाने के लिए प्रशासन आम जनता की जिंदगी और उनकी सुरक्षा से खिलवाड़ करता रहेगा? बिना किसी ठोस विभागीय जांच या नोटिस के मामले को रफा-दफा करने की यह कोशिश न केवल मरीजों के साथ विश्वासघात है, बल्कि उस सिस्टम की पारदर्शिता पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न है जो ईमानदारी का ढोंग रचता है। अब जनता और सामाजिक संगठन सीधे तौर पर प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं कि भ्रष्टाचार की इस साठगांठ में शामिल चेहरों को कब बेनकाब किया जाएगा और कब मैक्सालाइफ जैसे संस्थानों पर वह कानूनी चाबुक चलेगा जिसका वह हकदार है।



