बंजारी कटिया गेट पर कानून को ठेंगा: वन निगम के रजिस्ट्रेशन बेअसर, ‘गुंडागर्दी’ के आगे सिस्टम नतमस्तक!
अज़हर मलिक
नैनीताल। जनपद नैनीताल में खनन सत्र शुरू होते ही कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़नी शुरू हो गई हैं। एक तरफ धामी सरकार ‘पारदर्शिता’ और ‘सबका साथ-साथ विकास’ का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर बंजारी कटिया गेट पर कुछ अराजक तत्वों ने अपनी ‘निजी रियासत’ घोषित कर दी है। यहां नियम-कानून नहीं, बल्कि चंद लोगों की लाठी और दबंगई चल रही है।
प्रशासन की अनुमति, फिर भी ‘सड़क पर पहरा’
हैरानी की बात यह है कि वन निगम और प्रशासन की संयुक्त टीम ने नियमानुसार जांच-परख के बाद 10 टायर वाहनों को खनन कार्य के लिए हरी झंडी दी है। वाहन स्वामियों ने लाखों रुपये खर्च कर गाड़ियां खरीदीं और सरकारी फीस जमा कर रजिस्ट्रेशन कराया। लेकिन धरातल पर स्थिति यह है कि कुछ लोग इन वाहनों को जबरन रोक रहे हैं। सवाल यह है कि जब सरकार ने अनुमति दी है, तो ये ‘स्वयंभू पहरेदार’ कौन होते हैं जो यह तय करेंगे कि किसका वाहन चलेगा और किसका नहीं?
शिकायत है कि विरोध के नाम पर ड्राइवरों के साथ बदतमीजी और मारपीट आम हो गई है। कानून का हंटर चलाने वाली पुलिस और वन विभाग की टीमें इन गुंडई करने वालों के आगे बेबस नजर आ रही हैं। विरोध करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन विरोध की आड़ में सड़कें रोकना, काम बाधित करना और वाहन स्वामियों का मानसिक व आर्थिक उत्पीड़न करना सीधे तौर पर ‘लॉ एंड ऑर्डर’ को चुनौती है।
क्या ‘लोकल’ के नाम पर होगी अराजकता?
क्षेत्रवाद का सहारा लेकर वैध रजिस्ट्रेशन वाले वाहनों को रोकना न केवल उन व्यापारियों के साथ अन्याय है जिन्होंने कर्ज लेकर वाहन खरीदे हैं, बल्कि यह राज्य के राजस्व को भी बड़ी चोट है। यदि जिला प्रशासन और पुलिस ने समय रहते इन ‘सड़क छाप’ गुंडों पर नकेल नहीं कसी, तो नैनीताल जनपद में कोई भी व्यापारी सुरक्षित महसूस नहीं करेगा।
धामी सरकार से बड़ा सवाल: क्या आपकी ‘पारदर्शी’ व्यवस्था चंद अराजक तत्वों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है? क्या उन वाहन स्वामियों को न्याय मिलेगा जिन्होंने सरकारी नियमों पर भरोसा कर निवेश किया है? आखिर इन गुंडागर्दी करने वालों पर कानूनी हंटर कब चलेगा?