पतरामपुर रेंज में रेंजर की शह पर खैर के पेड़ों का कत्लेआम: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही बेशकीमती वन्य संपदा।

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पतरामपुर रेंज में रेंजर की शह पर खैर के पेड़ों का कत्लेआम: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही बेशकीमती वन्य संपदा।

                सलीम अहमद साहिल 

 

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रामनगर (तराई पश्चिमी डिवीजन): तराई पश्चिमी डिवीजन की पतरामपुर रेंज इन दिनों वन तस्करों की सुरक्षित पनाहगाह बन चुकी है, जहाँ रेंजर महेश सिंह बिष्ट की कार्यप्रणाली और उनकी रहस्यमयी चुप्पी ने विभाग की ईमानदारी पर गहरा कलंक लगा दिया है। माकोनियाँ बीट के कृपाचार्यपुर से सामने आ रही तस्वीरें रोंगटे खड़े करने वाली हैं, जहाँ बेशकीमती खैर के हरे पेड़ों को तस्करों द्वारा दिन-दहाड़े आरी से काटा जा रहा है और सबूत मिटाने के लिए पेड़ों के ठूँठों को कुल्हाड़ी से खोदकर जमीन में दफन किया जा रहा है। स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों का स्पष्ट आरोप है कि जब से रेंजर महेश सिंह बिष्ट ने पतरामपुर रेंज का कार्यभार संभाला है, तब से तस्करी की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है और यह रेंज अब तस्करी का मुख्य अड्डा बन चुकी है।

 

यह विश्वास करना कठिन है कि जिस जंगल की सुरक्षा का जिम्मा रेंजर के कंधों पर है, वहाँ तस्कर इतनी तसल्ली और बेखौफ अंदाज में पेड़ों का सफाया कर रहे हैं; यह बिना विभागीय मिलीभगत और रेंजर के ‘आशीर्वाद’ के संभव नहीं दिखता।

 

 

हैरानी की बात यह है कि विभाग के उच्च पदों पर बैठे अधिकारी, विशेषकर उप प्रभागीय वनाधिकारी संदीप गिरी, जिन्हें कभी तेजतर्रार अधिकारियों में गिना जाता था, उनके कार्यकाल में भी रेंजर की मनमानी और तस्करों का राज चरम पर है। क्या संदीप गिरी का अपने मातहत कर्मचारियों पर नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो चुका है, या फिर इस लूट में ऊपर से नीचे तक मौन सहमति बनी हुई है? रेंजर की आँखों के सामने जंगल उजड़ रहे हैं, पर्यावरण को अपूर्णीय क्षति हो रही है और राज्य सरकार को लाखों रुपये के राजस्व का चूना लगाया जा रहा है, लेकिन रेंजर साहब गहरी नींद में सोने का ढोंग कर रहे हैं। जिस तरह से माकोनियाँ बीट कृपाचार्यपुर में खैर का अस्तित्व मिटाया जा रहा है, उससे साफ है कि अगर इन लापरवाह अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो पतरामपुर रेंज जल्द ही रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगी। तस्करों के बुलंद हौसले और रेंजर की कार्यशैली पर उठते ये सवाल चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यहाँ रक्षक ही भक्षक की भूमिका में खड़ा है, और अब समय आ गया है कि शासन-प्रशासन इस “अवैध गठजोड़” की परतें उधेड़कर जिम्मेदार अधिकारियों को उनके अंजाम तक पहुँचाए।

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