एक ही परिवार, दो सीटें: सपा में टिकट से पहले ही ‘परिवारवाद’ की आहट? जनता के मुद्दे या चुनावी दिखावा? क्या ‘परिवार प्रोजेक्ट’ एक्टिव!

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एक ही परिवार, दो सीटें: सपा में टिकट से पहले ही ‘परिवारवाद’ की आहट? जनता के मुद्दे या चुनावी दिखावा? क्या ‘परिवार प्रोजेक्ट’ एक्टिव!

शानू कुमार ब्यूरो उत्तर 

बरेली: समाजवादी पार्टी जहां एक तरफ जनता के मुद्दों और सामाजिक न्याय की बात करती है, वहीं बरेली में पार्टी की अंदरूनी राजनीति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। जिले में एक ही परिवार के दो सदस्य दो अलग-अलग विधानसभा सीटों से चुनाव की तैयारी में जुटे हुए हैं, जिसने सियासी हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

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भोजीपुरा विधानसभा से सुल्तान बेग और बरेली कैंट विधानसभा से उनके ही भाई डॉ. अनीस बेग लगातार जनसभाएं, नुक्कड़ कार्यक्रम और डोर-टू-डोर संपर्क कर रहे हैं। दोनों की सक्रियता देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो टिकट की औपचारिक घोषणा भर बाकी हो।

 

 

 

परिवारवाद बनाम कार्यकर्ताओं की अनदेखी

 

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी में अब ज़मीनी कार्यकर्ताओं की जगह पारिवारिक समीकरण ज्यादा अहम हो गए हैं? वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी बताई जा रही है कि एक ही परिवार के दो लोगों का एक साथ आगे आना क्या सही संदेश देता है।

जनता के मुद्दे या चुनावी दिखावा?

 

 

 

सूत्रों की मानें तो जनसभाओं और नुक्कड़ कार्यक्रमों में बड़े-बड़े वादे तो किए जा रहे हैं, लेकिन स्थानीय समस्याओं—जैसे बेरोजगारी, बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं—पर ठोस रोडमैप कहीं नजर नहीं आ रहा। सवाल उठ रहा है कि ये कार्यक्रम जनता के लिए हैं या सिर्फ टिकट हासिल करने की कवायद?

 

 

सपा नेतृत्व की चुप्पी पर सवाल

सबसे अहम बात यह है कि पूरे मामले पर समाजवादी पार्टी के जिला और प्रदेश नेतृत्व की चुप्पी कई तरह की अटकलों को जन्म दे रही है। क्या यह चुप्पी मौन सहमति है, या फिर पार्टी के भीतर सब कुछ पहले से तय हो चुका है?

 

 

 

जनता करेगी फैसला

 

फिलहाल, बरेली की सियासत में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या पार्टी एक ही परिवार को दो-दो सीटों से आगे बढ़ाने का जोखिम उठाएगी, या फिर जनता और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को देखते हुए कोई अलग फैसला लिया जाएगा।

आखिरकार, लोकतंत्र में फैसला जनता का होता है—पर सवाल यह है कि क्या विकल्प भी जनता को मिलेंगे?

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