पतरामपुर रेंज में खैर पेड़ो के नरसंहार की चीखो से जंगल गूंज रहा है: रेंजर महेश सिंह बिष्ट की शह पर लुटी वन संपदा, क्या रक्षक ही बन बैठा है भक्षक?
सलीम अहमद साहिल
तराई पष्चिमी डिवीजन रामनगर की पतरामपुर रेंज इस वक्त भ्रष्टाचार और वन तस्करी के एक ऐसे काले अध्याय का गवाह बन रही है, जिसने पूरे वन विभाग की साख को धूल में मिला दिया है। माकोनियाँ बीट के कृपाचार्यपुर में 36 से अधिक बेशकीमती खैर के हरे पेड़ों का कत्लेआम की तस्वीरें अब बाहर आ चुकी है।
रेंजर महेश सिंह बिष्ट की कार्यशैली पर न केवल गंभीर सवाल खड़ा करता है, बल्कि उनकी भूमिका को पूरी तरह संदिग्ध बना देता है। मीडिया द्वारा सबूतों के साथ लगातार इस महालूट को उजागर करने के बावजूद रेंजर साहब की रहस्यमयी चुप्पी और निष्क्रियता यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वे जंगल की सुरक्षा के लिए नियुक्त किए गए हैं या फिर तस्करों के सिंडिकेट को ‘अभय दान’ देने के लिए? हैरानी की बात यह है कि जब तस्कर दिन-दहाड़े आरी चलाकर जंगल को लहूलुहान कर रहे हैं और साक्ष्य मिटाने के लिए ठूँठों को आग के हवाले कर रहे हैं, तब रेंजर महेश सिंह बिष्ट गहरी नींद सोने का ढोंग कर रहे हैं। क्या वन मंत्री और विभाग के उच्चाधिकारी इस कदर बेखबर हैं कि उन्हें मीडिया इस पुरे खैर के हरे अवैध पेड़ो के लहूलुहान गम्भीर प्रकरण की खबरों को पुख्ता सबूतों के साथ दिखा रहा है। खैर के हरे पेड़ो की अवैध कटान की चीखो से भले ही जंगल गूंज रहे है लेकिन जिम्मेदार अधिकारी पर शासन दोनों को की ये चीखें सुनाई नहीं दे रहीं, या फिर रेंजर का रसूख इतना बड़ा हो चुका है कि शासन-प्रशासन कार्रवाई करने से थर-थर कांप रहा है? जिस बेशर्मी से यहाँ प्रकृति का सीना चाका किया जा रहा है, वह बिना रेंजर की मिलीभगत और ‘आशीर्वाद’ के कदापि संभव नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे लापरवाह और भ्रष्ट मानसिकता वाले अधिकारी को अब तक उसकी कुर्सी से हटाकर रेंज से बाहर क्यों नहीं फेंका गया? क्या सरकार और जिम्मेदार अधिकारी किसी और बड़े विनाश की प्रतीक्षा कर रही है? अपनी वर्दी और पद का अपमान करने वाले ऐसे रेंजर को तत्काल प्रभाव से क्यों नहीं हटाना गया?और उनके कार्यकाल की उच्चस्तरीय जांच करना अनिवार्य रूप से क्यों शुरू नहीं हुई? यदि अब भी शासन ने इस ‘अवैध गठजोड़’ पर प्रहार नहीं किया और रेंजर की कुर्सी पर आंच नहीं आई, तो यह साफ हो जाएगा कि पतरामपुर का जंगल किसी रक्षक के हाथों में नहीं, बल्कि एक ऐसे भक्षक के हवाले है जो खुद इस लूट का मुख्य सूत्रधार है।
पतरामपुर रेंज की माकोनियाँ बीट के कृपाचार्यपुर से अब तक 36 पेड़ो की तस्वीरें सामने आ चुकी है। खैर का जंगल चीख चीख कर इंसाफ की मांग कर रहा है काटे गये पेड़ो के ठुठ अपने क़त्ल की गवाही दे रहे है। लेकिन मौन प्रकृति के प्रहरीयो की चीखे किसी जिम्मेदार को सुनाई नहीं दे रही है। विश्वसनीय सूत्र बताते है की खबर की बोखलाट से रेंजर साहब ने तस्करो को सबूत मिटाने की पूरी छूट देदी है। इसकी जाँच तब शुरू होंगी जब सारे सबूत ख़त्म हो जायगे। इस गम्भीर प्रकरण की जांच भी होंगी और सबूत ना मिलने से रेंजर साहब और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों को साबुन ना मिलने के आभाव मे क्लीन चिट देदी जायगी और पूरा प्रकरण समाप्त हो जायगा।
जो बोल नहीं सके, वही सबसे पहले काट दिए गए। छाया, सांस और जीवन देने वाले ये बेज़ुबान पेड़ आज ज़मीन की गोद मे समा गये और पेड़ो के खून के धब्बो पर मिट्टी डाली जा रही है। यह कटान नहीं व्यवस्था की चुप्पी से हुआ हरा कत्ल है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग यदि मौन हैं। तो अपराध सिर्फ जंगल में नहीं, फाइलों में भी हो रहा है।