नन्ही सी जान के ‘कातिल’ विधायक त्रिलोक सिंह चीमा 20 साल बाद मंच पर सरेआम कबूला अपना खूनी गुनाह!

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नन्ही सी जान के ‘कातिल’ विधायक त्रिलोक सिंह चीमा 20 साल बाद मंच पर सरेआम कबूला अपना खूनी गुनाह!

अज़हर मलिक

सोचिए, जब एक बेजुबान, नन्ही सी जान किसी के मनोरंजन और शौक की भेंट चढ़ जाए, तो उस मासूम खून का हिसाब कौन देगा? एक ऐसा ही रूह कंपा देने वाला मामला काशीपुर से सामने आया है, जहां अपनों के बीच बैठे एक रसूखदार शख्स ने खुद को एक ‘खूनी’ के रूप में पेश कर सबको सन्न कर दिया। आज काशीपुर नगर निगम के सभागार में महापौर दीपक बाली के एक सफल साल के कार्यकाल का जश्न मनाया जा रहा था, हर तरफ खुशियां और तालियां थीं, लेकिन तभी मंच पर आए काशीपुर विधायक त्रिलोक सिंह चीमा। किसी ने नहीं सोचा था कि विकास की बातें करने वाले विधायक जी के दामन पर एक ऐसा दाग है जिसे वो 20 सालों से छुपाए बैठे हैं।

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विधायक चीमा ने उस क्रूर मंजर को याद करते हुए बताया कि कैसे 20 साल पहले उनके भीतर का शिकारी जागा था। अपने बच्चों के मनोरंजन के लिए खरीदी गई एयर गन लेकर जब वो अपने बेटे के साथ निकले, तो उनकी नजर एक ऊंचे यूकेलिप्टस के पेड़ पर बैठी एक नन्ही, बेकसूर चिड़िया पर पड़ी। बिना यह सोचे कि उस छोटी सी जान की भी कोई दुनिया होगी, विधायक ने बंदूक तानी और ट्रिगर दबा दिया। वो गोली सीधी उस चिड़िया को जाकर लगी। क्रूरता की पराकाष्ठा तो तब दिखी जब वो पक्षी लहूलुहान होकर नीचे गिरा और उसकी एक आंख निकलकर शरीर से दूर जा गिरी। उस वक्त संवेदनाएं मर चुकी थीं; बाप-बेटे ने उस नन्ही लाश को गड्ढे में दबाकर सबूत मिटा दिए।

 

 

 

लेकिन जैसे-जैसे खबर आगे बढ़ी, विधायक का चेहरा क्रूरता से हटकर गहरी पीड़ा और पश्चाताप की ओर मुड़ गया। 60 साल की उम्र के इस पड़ाव पर, जहां इंसान को अपनी गलतियों का हिसाब नजदीक दिखने लगता है, विधायक चीमा का दर्द फूट पड़ा। उन्होंने रुंधे हुए गले से स्वीकार किया कि वो एक आंख वाली चिड़िया आज भी उनकी रातों की नींद उड़ा देती है। 20 साल बीत गए, लेकिन उस मासूम की ‘हत्या’ का बोझ उनकी आत्मा से नहीं उतरा। आज वही विधायक जो कभी बंदूक थामे शिकार पर निकले थे, पशु-पक्षियों के रक्षक और प्रेमी बनकर उभरे हैं। उनके दिल में बेजुबानों के लिए जो तड़प आज दिखी, उसने सभागार में मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। विधायक ने बताया कि कैसे वो एक ‘गलती’ आज उनके लिए एक कभी न खत्म होने वाला मानसिक कारावास बन गई है, और वो हर दिन उस नन्ही जान से माफी मांगते हैं।

 

 

 

कानूनी तौर पर देखा जाए तो यह ‘वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972’ के तहत एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन त्रिलोक सिंह चीमा के भीतर बैठी उनकी अंतरात्मा की अदालत उन्हें आज भी मुजरिम मानती है, और यही वजह है कि आज एक सार्वजनिक मंच पर उन्होंने अपना दर्द साझा कर दुनिया को यह बताया कि बेजुबानों पर ढाया गया सितम इंसान को कभी सुख से जीने नहीं देता।

 

 

 

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