RTI की गरिमा बनाम ब्लैकमेलिंग का खेल: क्या पारदर्शिता की आड़ में ‘मैनेजमेंट’ को न्यायोचित ठहराया जा सकता है?
अज़हर मलिक
हाल ही में RTI के दुरुपयोग पर उठाए गए सवालों के जवाब में कुछ ‘तर्कों’ ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। यह सही है कि सूचना का अधिकार एक संवैधानिक हथियार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस हथियार का इस्तेमाल ‘जनहित’ के लिए हो रहा है या ‘व्यक्तिगत स्वार्थ’ की तिजोरी भरने के लिए? जब हम RTI के दुरुपयोग की बात करते हैं, तो हमारा निशाना वह कानून नहीं, बल्कि वे ‘मुखौटाधारी’ हैं जो इस कानून को उगाही का लाइसेंस मान बैठे हैं।
1. सवाल नीयत पर है, कानून पर नहीं
RTI कानून का स्वागत हर ईमानदार नागरिक करता है। लेकिन आपत्ति वहां होती है जब सूचनाएं केवल इसलिए मांगी जाती हैं ताकि संबंधित अधिकारी या विभाग पर दबाव बनाया जा सके। हैरानी की बात यह है कि जो सूचनाएं ‘भ्रष्टाचार’ का बड़ा शोर मचाकर मांगी जाती हैं, वे ‘लेन-देन’ की टेबल पर पहुँचते ही अचानक ठंडे बस्ते में क्यों चली जाती हैं? यदि सूचना मांगने वाले का मकसद पारदर्शिता था, तो उसने उस सूचना को सार्वजनिक मंचों या कोर्ट तक क्यों नहीं पहुँचाया? फाइलों का इस तरह गायब होना ही ‘ब्लैकमेलिंग’ के दावों को पुख्ता करता है।
2. ‘रिकॉर्ड’ और ‘तथ्य’ में फर्क समझिए
यह तर्क देना कि “सवाल उठाने वाले भी RTI लगाते हैं”, असल मुद्दे से भटकाने जैसा है। RTI लगाना कोई अपराध नहीं है, लेकिन सूचना निकालने के बाद उसका सौदा करना जघन्य अपराध है। एक ईमानदार कार्यकर्ता सूचना मिलने पर व्यवस्था सुधार की लड़ाई लड़ता है, जबकि एक ‘ब्लैकमेलर’ सूचना मिलने पर अपनी अगली किस्त की तारीख तय करता है। जनता यह बखूबी समझती है कि कौन व्यवस्था के लिए लड़ रहा है और कौन व्यवस्था के साथ ‘सेटिंग’ कर रहा है।
3. प्रशासनिक विफलता या ‘फर्जी’ सक्रियता?
यह कहना कि “कार्रवाई न होना प्रशासनिक विफलता है”, आधा सच है। सच तो यह है कि कई बार ये ‘फर्जी समाजसेवी’ विभागों पर इतना दबाव बना देते हैं कि अधिकारी जनहित के काम करने के बजाय इनके अनावश्यक और द्वेषपूर्ण आवेदनों के जवाब तैयार करने में ही उलझे रहते हैं। यह विकास कार्यों में जानबूझकर अड़ंगा लगाने की एक सोची-समझी साजिश है।
4. दूध का दूध और पानी का पानी होना जरूरी
हम धामी सरकार से यही मांग कर रहे हैं कि एक ऐसी व्यवस्था बने जिससे सफेदपोश ब्लैकमेलरों और असली सूचना सेनानियों के बीच का अंतर स्पष्ट हो सके।
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- क्या उन लोगों की जांच नहीं होनी चाहिए जिनके द्वारा मांगी गई बड़ी-बड़ी सूचनाएं कभी किसी नतीजे तक नहीं पहुँची?
- क्या उनकी आय के स्रोतों की जांच नहीं होनी चाहिए जो बिना किसी ज्ञात आय के ‘समाजसेवा’ के नाम पर आलीशान जीवन जी रहे हैं?
RTI कानून लोकतंत्र का गहना है, और इसे सुरक्षित रखने के लिए उन ‘दीमकों’ को साफ करना जरूरी है जो इसकी आड़ में अपना घर भर रहे हैं। हम पारदर्शिता के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ‘ट्रांसपेरेंसी’ के खिलाफ हैं जो केवल ब्लैकमेलर की जेब तक सीमित रह जाती है। लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी रहेगी—चाहे वह विभाग के अंदर हो या समाजसेवा के चोले में बाहर।