पतरामपुर रेंज में खैर के 50 पेड़ो की तस्वीरे सार्वजनिक। रेंजर की संदिग्ध भूमिका और तंत्र की बेशर्मी ने उजाड़ दिया 40 लाख का हरा सोना। वन तंत्र बेनकाब।
सलीम अहमद साहिल
तराई पश्चिमी डिवीजन रामनगर की पतरामपुर रेंज इस वक्त भ्रष्टाचार और वन तस्करी के एक ऐसे काले अध्याय का गवाह बन रही है, जिसने पूरे वन विभाग की साख को धूल में मिला दिया है। माकोनियाँ बीट के कृपाचार्यपुर में लगभग 50 के करीब बेशकीमती खैर के हरे पेड़ों के कत्लेआम की तस्वीरें अब सार्वजनिक हो चुकी हैं। पतरामपुर की एक बीट मे ऐसे तांडव मचा हुआ है पुरे रेंज मे कितने हरे और सूखे खैर, सागोन, साल के पेड़ो की कब्ररे खोदी गई होंगी ये भी एक उच्च स्तरीय जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।

यह महालूट रेंजर महेश सिंह बिष्ट की कार्यशैली पर न केवल गंभीर सवाल खड़ा करती है, बल्कि उनकी भूमिका को पूरी तरह संदिग्ध बना देती है। जानकारों की मानें तो इन पेड़ों की बाज़ार में अनुमानित कीमत लगभग 40 लाख रुपये के आसपास आंकी जा रही है। हैरानी की बात यह है कि जब तस्कर दिन-दहाड़े आरी चलाकर जंगल को लहुलुहान कर रहे थे, तब रेंजर साहब अपनी जिम्मेदारी से मुंह फेरे बैठे थे। क्या यह मुमकिन है कि रेंजर की नाक के नीचे इतना बड़ा कांड हो जाए और उन्हें खबर तक न हो? इतनी बड़ी संख्या मे हरे पेड़ एक दिन मे काटना मुमकिन हो है?या फिर यह रक्षक ही भक्षक बनकर तस्करों के सिंडिकेट को ‘अभय दान’ दे रहे है?

मीडिया द्वारा साक्ष्यों के साथ लगातार इस लूट को उजागर करने के बावजूद रेंजर की रहस्यमयी चुप्पी यह सोचने पर मजबूर करती है कि वे जंगल की सुरक्षा के लिए हैं या सबूत मिटाने के लिए? विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि रेंजर की शह पर अब जंगल में पेड़ों के ठूँठों को आग के हवाले किया जा रहा है और साक्ष्य मिटाने के लिए उन पर मिट्टी डाली जा रही है। इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा शर्मनाक भूमिका विभाग के उन सीनियर अधिकारियों की है, जिन्हें मीडिया द्वारा पुख्ता सबूत दिए जाने के बाद भी वे धृतराष्ट्र बने बैठे हैं। रेंजर का रसूख इतना बड़ा हो चुका है।

कि शासन-प्रशासन कार्रवाई करने से थर-थर कांप रहा है। 40 लाख की वन संपदा की इस डकैती पर उच्चाधिकारियों का मौन यह संकेत देता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं। यदि इस लापरवाह और संदिग्ध कार्यप्रणाली वाले अधिकारी को तत्काल पद से हटाकर उच्चस्तरीय जांच नहीं की गई, तो यह साफ हो जाएगा कि पतरामपुर का जंगल किसी रक्षक के हाथों में नहीं, बल्कि एक ऐसे भक्षक के हवाले है जो खुद इस लूट का मुख्य सूत्रधार है।
