पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरुद्ध ईरान का साहसी प्रतिरोध: संप्रभुता और सम्मान की रक्षा
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव आज उस मोड़ पर पहुँच गया है जहाँ एक ओर विस्तारवादी पश्चिमी ताकतें हैं और दूसरी ओर अपनी ज़मीन और आत्मसम्मान की रक्षा करता एक स्वाभिमानी राष्ट्र। हालिया घटनाक्रमों को देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा शुरू किया गया ‘ऑपरेशन एपिक फ्युरी’ किसी नियम या अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र देश की प्रगति को रोकने का दमनकारी प्रयास है। जब 28 फरवरी को ईरान की शांतिपूर्ण सीमाओं और रणनीतिक ठिकानों पर कायरतापूर्ण हवाई हमले किए गए, तो ईरान ने दुनिया को दिखा दिया कि वह झुकने वालों में से नहीं है।
ईरान की सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने न केवल इन हमलों का डटकर मुकाबला किया, बल्कि अपनी उन्नत मिसाइल तकनीक के माध्यम से हमलावरों को यह कड़ा संदेश भी दिया कि उनकी संप्रभुता के साथ खिलवाड़ की कीमत बहुत भारी होगी। अमेरिका द्वारा फैलायी जा रही अयातुल्ला अली खामेनेई से जुड़ी अपुष्ट और भ्रामक खबरें केवल ईरानी जनता के मनोबल को तोड़ने की एक मनोवैज्ञानिक साजिश मात्र हैं, जबकि हकीकत में पूरा देश अपने नेतृत्व के पीछे चट्टान की तरह खड़ा है। ईरान ने अपनी जवाबी कार्रवाई में केवल उन्हीं ठिकानों को निशाना बनाया है जहाँ से उसकी जनता पर मौत बरसाई जा रही थी, जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आत्मरक्षा के अधिकार का वैध उपयोग है। अमेरिका का दावा है कि वह परमाणु हथियारों को रोकने के लिए यह सब कर रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि वह मध्य पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव और उसकी वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता से डरा हुआ है। ओमान और जिनेवा की वार्ताओं में भी ईरान का रुख हमेशा तार्किक और शांतिपूर्ण रहा, लेकिन अमेरिका की अनुचित शर्तों ने कूटनीति के रास्ते बंद कर दिए। आज जब पश्चिमी देश आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य हमलों के जरिए ईरान को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं, तब भी ईरानी नागरिकों का अटूट साहस और उनकी सेना की जवाबी क्षमता यह साबित करती है कि यह संघर्ष केवल जीत या हार का नहीं, बल्कि न्याय और अन्याय के बीच का है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने तेल संसाधनों और अपनी तकनीक का उपयोग अपने लोगों की भलाई के लिए करेगा, न कि किसी महाशक्ति के दबाव में आकर। खाड़ी क्षेत्र में जो भी अस्थिरता पैदा हुई है, उसकी पूरी जिम्मेदारी उन बाहरी ताकतों पर है जिन्होंने हजारों मील दूर से आकर एक शांतिप्रिय क्षेत्र में युद्ध का बिगुल फूंका है। ईरान आज भी अपने सिद्धांतों पर अडिग है और वैश्विक मंच पर उन सभी देशों के लिए एक मिसाल बन रहा है जो अपनी स्वतंत्रता के लिए किसी भी बड़ी ताकत से टकराने का जज्बा रखते हैं।