सफेद कोट के पीछे ‘लापरवाही’ का काला खेल, मौत के मुहाने पर जनता!
: काशीपुर का राजकीय एल.डी. भट्ट उपजिला चिकित्सालय इन दिनों इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले मासूम तीमारदारों और मरीजों के लिए जीवनदान नहीं, बल्कि साक्षात ‘यमलोक’ का द्वार साबित हो रहा है, जहाँ मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) डॉ. एस. के. दीक्षित की घोर प्रशासनिक नपुंसकता और संवेदनहीनता ने पूरे अस्पताल परिसर को जानलेवा संक्रमण का ‘नर्सरी फॉर्म’ बना दिया है। अस्पताल के रिहायशी इलाकों और एम्बुलेंस स्टैंड के समीप लगे बायो-मेडिकल वेस्ट के ऊँचे-ऊँचे अंबार चीख-चीख कर चीथड़े होते सिस्टम की गवाही दे रहे हैं, जहाँ खून से सनी पट्टियाँ, संक्रमित सुइयां और घातक कचरा खुले में आवारा कुत्तों का निवाला बन रहा है—ये वही कुत्ते हैं जो संक्रमण के इस ‘मौत के सामान’ को रिहायशी बस्तियों तक पहुँचा रहे हैं, जिससे हेपेटाइटिस B, C, सेप्टीसीमिया और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी कालजयी महामारियों का तांडव काशीपुर की देहरी पर दस्तक दे रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के सख्त नियमों को ठेंगे पर रखकर डॉ. दीक्षित की सरपरस्ती में फैलाया गया यह कचरा न केवल स्टाफ क्वार्टर में रहने वाले बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है, बल्कि पुष्कर सिंह धामी सरकार की ‘स्वच्छ उत्तराखंड-स्वस्थ उत्तराखंड’ की मुहिम पर भी एक बदनुमा दाग है। ताज्जुब की बात यह है कि जब इस नरक के बारे में जिम्मेदार CMS साहब से जवाब मांगा जाता है, तो वे अपनी जवाबदेही को नगर निगम की गाड़ियों पर थोपकर ‘धृतराष्ट्र’ की तरह अपनी कुर्सी के रसूख में मदमस्त नज़र आते हैं। सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी और सूबे के मुखिया इस आपराधिक लापरवाही के सूत्रधार डॉ. दीक्षित पर कठोर हंटर चलाएंगे, या फिर काशीपुर की भोली-भाली जनता भ्रष्टाचार और सेटिंग-गेटिंग के इस खेल में किसी बड़ी महामारी की बलि चढ़ने का इंतजार करेगी?