उत्तराखंड में ‘अदृश्य’ न्याय: बिना दूल्हे की बारात जैसा लोकायुक्त कार्यालय

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उत्तराखंड में ‘अदृश्य’ न्याय: बिना दूल्हे की बारात जैसा लोकायुक्त कार्यालय

 19 करोड़ का ‘सफेद हाथी’: कुर्सी खाली, फाइलें भारी और जनता की उम्मीदें लाचार

.जीरो टॉलरेंस का ‘डार्क’ सच: 1732 शिकायतें और 12 साल का लंबा इंतज़ार

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काशीपुर/देहरादून। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक ऐसा दफ्तर जहाँ साहब की कुर्सी 12 सालों से धूल फाँक रही हो, जहाँ न्याय करने वाला कोई न हो, फिर भी वहां हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाएं? ताज्जुब की बात यह है कि जिस सिस्टम में मुखिया ही गायब हो, वहां जनता आज भी इस उम्मीद में चिट्ठियां लिख रही है कि शायद कभी कोई सुनने वाला आएगा। देवभूमि उत्तराखंड के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों के पीछे एक ऐसा तिलिस्म छिपा है, जिसे सूचना के अधिकार ने बेनकाब कर दिया है। यह कहानी किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं है, जहाँ 2013 से लोकायुक्त की तलाश जारी है, लेकिन फाइलें हैं कि रुकने का नाम नहीं ले रहीं। काशीपुर के आरटीआई एक्टिविस्ट नदीम उद्दीन द्वारा निकाली गई जानकारी से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि बिना लोकायुक्त के ही इस कार्यालय पर अब तक 19.64 करोड़ रुपये से अधिक की मोटी धनराशि सरकारी खजाने से लुटाई जा चुकी है।

हैरानी की बात यह है कि जब रक्षक ही मैदान में नहीं है, तब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाली जनता ने हार नहीं मानी है और लोकायुक्त पद रिक्त होने के बाद से अब तक 1096 नई शिकायतें उस दफ्तर की दहलीज तक पहुँच चुकी हैं, जहाँ कोई फैसला लेने वाला ही मौजूद नहीं है। वर्तमान में कुल 1732 शिकायतें ‘इंसाफ’ की बाट जोह रही हैं। यह आँकड़े गवाही दे रहे हैं कि प्रदेश के रसूखदार लोक सेवक शायद खुद ही नहीं चाहते कि इस खाली कुर्सी पर कोई बैठे, क्योंकि कार्रवाई का डर अपनों को ही सता रहा है। साल दर साल शिकायतों का अंबार बढ़ता गया—2022 से 2025 के बीच 118 और अकेले 2026 के शुरुआती महीनों में ही 15 नई शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। विडंबना देखिए कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सख्त रुख के बावजूद सरकार ने केवल आश्वासनों की घुट्टी पिलाई है। हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की पीठ ने इस लेत-लतीफी पर अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए 1 अप्रैल 2026 की अगली तारीख मुकर्रर की है। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह ‘खाली कमरा’ कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई बड़ा एक्शन लेगा या फिर हर साल करोड़ों के बजट की आहुति देकर इसे महज़ एक ‘शो-पीस’ बना कर रखा जाएगा? जनता की 1732 उम्मीदें फिलहाल उत्तराखंड की सियासत और फाइलों के बीच दम तोड़ रही हैं।

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