रामनगर वन प्रभाग में कोशी रेंज के रेंजर की मेहरबानी या गहरी नींद? आरक्षित जंगलों में मौत का ‘डेंजर टूरिज्म’, क्या बाघ के जबड़े में पर्यटकों को धकेलने का इंतजार कर रहा था विभाग!
सलीम अहमद साहिल
रामनगर के कोसी रेंज से जो तस्वीर सामने आई है, उसने वन विभाग की कार्यशैली और रेंजर की मुस्तैदी पर ऐसे सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब देना अब प्रशासन के लिए भारी पड़ रहा है। मामला मचान रिसॉर्ट के कर्मचारियों द्वारा पर्यटकों को आरक्षित वन भूमि के उस संवेदनशील इलाके में घुमाने का है, जहाँ कदम-कदम पर बाघ, हाथी और तेंदुए जैसे हिंसक वन्यजीवों का पहरा रहता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर रेंजर और उनकी गश्ती टीमें उस वक्त कहाँ खर्राटे भर रही थीं, जब मौत का यह खेल सरेआम खेला जा रहा था?
क्या यह माना जाए कि जिनकी जिम्मेदारी जंगलों की हिफाजत और वन्यजीवों की सुरक्षा की थी, वे अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे थे? हैरान करने वाली बात यह है कि इस गंभीर उल्लंघन पर वन विभाग की नींद तब खुली जब सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो वायरल होकर विभाग की किरकिरी कराने लगे। आखिर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या गश्त के दावे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि यह कोई पहला मामला नहीं होगा; न जाने ऐसे कितने ही रसूखदार और लापरवाह लोग अपनी जान जोखिम में डालकर जंगल के प्रतिबंधित हिस्सों में घुसपैठ कर रहे होंगे, जो कैमरे में कैद नहीं हो पाए इसलिए वे ‘तथ्य’ और ‘कहानियां’ फाइलों में दबकर रह गईं।
आज जनता पूछ रही है कि अगर किसी हिंसक जानवर ने इन पर्यटकों पर हमला कर दिया होता, तो उस लाश का जिम्मेदार कौन होता? क्या वह लापरवाह रेंजर अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता जो अपनी नाक के नीचे हो रहे इस खिलवाड़ से बेखबर बना रहा? जब इतनी बड़ी लापरवाही जगजाहिर हो चुकी है, तो फिर ऐसे लापरवाह अधिकारियों पर शिकंजा कसने में विभाग क्यों कतरा रहा है? किसके संरक्षण में ये रेंजर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े बैठे हैं? शक की सुई और गहरी हो जाती है क्योंकि यदि एक पर्यटक दल इतनी आसानी से आरक्षित क्षेत्र में घुसकर नियमों की धज्जियां उड़ा सकता है, तो क्या वाकई जंगलों के माफिया और लकड़ी तस्कर तथा वन्यजीव शिकारी भी इसी लापरवाही का फायदा उठाकर वन संपदा को लूट रहे होंगे?
क्या वन्यजीवों की जिंदगी को इन लापरवाह अधिकारियों ने खिलौना समझ लिया है? महकमे की यह मेहरबानी और रेंजर की यह संदिग्ध खामोशी भ्रष्टाचार और कर्तव्यहीनता की ओर इशारा करती है। कोशी रेंज के रेंजर साहब ने टूरिस्टो की ज़िन्दगी वन्यजीवो की सुरक्षा को दाओ पर लगाने के सामवेदनशील मामले को एक नोटिस भेज कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कोसी रेंज का यह नोटिस सिर्फ एक खानापूर्ति नजर आता है, असली सवाल तो उस रेंजर की जवाबदेही पर है जिसने अपनी रेंज को लावारिस छोड़ दिया है। अपने ऑफिस की चार दीवारों से बाहर निकल कर ये देखने की जहमत नहीं उठा रहे है हमारे गस्ती दल जंगलो मे घूम रहे है या नहीं ज़ब वन विभाग की लापरवाह कार्यशैली की वजह से किसी इंसान की बेमोल जान वन्यजीवो के जबड़ो मे चली जाती है तो उसे हादसा कहके मामले को रफादाफा कर दिया जाता है। आखिर किसकी शह पर यह रेंजर कानून को ठेंगा दिखा रहा है और कब तक ऐसे अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा बेगुनाह वन्यजीवों और अनभिज्ञ पर्यटकों को भुगतना पड़ेगा? यह जांच का विषय नहीं, बल्कि कठोर कार्रवाई का वक्त है।
जिस रेंजर और वन विभाग के कर्मचारियों पर जंगल, वन्यजीवों और टूरिस्टों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उनकी नाकामी अब खुलकर सामने आ गई है। सवाल यह है कि होटल के अदने से कर्मचारी आखिर किसके संरक्षण में टूरिस्टों को मौत के मुंह समान जंगलों में ले गए? जब टूरिस्ट घंटों जंगल में घूम रहे थे तब रेंजर साहब और उनके गश्ती दल कहां थे? कहीं टूरिस्टों को जंगल घुमाने के नाम पर मोटी रकम तो नहीं वसूली जा रही है इस बंदरबांट में वन विभाग की मिलीभगत तो नहीं? यह गंभीर जांच का विषय है।



