अरबी चश्मा और भारतीय ज़मीन: मदनी साहब, हिंसा के लिए ‘वजह’ कैसी?
हाल ही में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी का एक बयान आया, जिसने एक बार फिर भारत के वैचारिक विमर्श को झकझोर दिया है। पड़ोसी देश बांग्लादेश में जब सनातनी अल्पसंख्यकों के घर जलाए जा रहे थे, मन्दिरों को अपवित्र किया जा रहा था, तब मदनी साहब ने तर्क दिया कि “इस्लाम बिना वजह ज्यादती की इजाजत नहीं देता।”
मदनी साहब के इस बयान में छिपा ‘वजह’ (Reason) शब्द अत्यंत चिंताजनक है। यह शब्द एक ऐसी ‘चोर-खिड़की’ खोलता है, जहाँ कट्टरपंथी किसी भी अपराध के पीछे एक वजह तलाश कर उसे जायज ठहराने की कोशिश करते हैं। क्या किसी मासूम की हत्या या धर्मस्थल का अपमान खुदा की नजर में कभी जायज हो सकता है?
यह देखना दुखद है कि भारत के कुछ मजहबी रहनुमा ‘चयनात्मक संवेदना’ के शिकार हैं। जब भारत में कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना होती है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया जाता है, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं के नरसंहार पर मौन साध लिया जाता है। एक सच्चा भारतीय वही है जो अपराधी का मजहब नहीं, बल्कि उसका कृत्य देखता है।
हमारा सिद्धांत: ‘No Cow Lynching, No Man Lynching’
गाय इस देश की सनातनी संस्कृति की रूह है। करोड़ों भारतीयों की आस्था के केंद्र गौ-वंश का अपमान भारतीय पहचान पर हमला है। वहीं दूसरी ओर, कानून को हाथ में लेकर किसी भी इंसान की भीड़ द्वारा हत्या करना भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। हम दोनों के ही सख्त खिलाफ हैं।
आज समय की पुकार है कि हम ‘अरबी कट्टरपंथ’ के चश्मे को उतार फेंकें और भारतीय राष्ट्रवाद की खुली हवा में सांस लें। भारत को अब विभाजनकारी फतवों की नहीं, बल्कि एकता और स्वाभिमान के शंखनाद की जरूरत है।