इबादत का सही तरीका: नमाज़ कैसे पढ़ें और कौन सी सूरतें हैं ज़रूरी
अक्सर भागदौड़ भरी जिंदगी में हम इबादत तो करते हैं, लेकिन क्या हमारा तरीका सुन्नत के मुताबिक है? रमज़ान का पाक महीना रूहानी पाकीज़गी का वक्त है। अगर आप नमाज़ शुरू करना चाहते हैं या अपने बच्चों को सिखाना चाहते हैं, तो यह जानना बेहद ज़रूरी है कि नमाज़ की हर रकात में दिल और दिमाग का हाजिर होना कितना लाज़मी है। चलिए, आज रूहानियत के इस सफर में कदम बढ़ाते हैं।
नमाज़ का मुकम्मल तरीका:
नमाज़ सिर्फ झुकने और सजदा करने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह से सीधा राब्ता (सम्पर्क) है।
वज़ू और नीयत: सबसे पहले पाक-साफ होकर किबला रुख खड़े हों और दिल में उस नमाज़ की नीयत करें जो आप पढ़ रहे हैं।
तकबीर-ए-तहरीमा: ‘अल्लाहु अकबर’ कहकर हाथ कानों तक उठाएं और नाफ के नीचे बांध लें।
सना और किरात: इसके बाद ‘सना’ पढ़ें, फिर ‘सूरह फातिहा’ (अल्हम्दु शरीफ) और उसके साथ कुरान की कोई भी एक सूरत मिलाएं।
रुकू और सजदा: अल्लाह की बड़ाई बयान करते हुए झुकें और फिर जमीन पर माथा टेककर अपने खालिक के सबसे करीब पहुंच जाएं।
नमाज़ में पढ़ी जाने वाली खास सूरतें (तर्जुमे के साथ):
यूं तो कुरान की कोई भी सूरत पढ़ी जा सकती है, लेकिन ये छोटी सूरतें याद करना आसान हैं:
सूरह इखलास: कुल हुवल लाहू अहद… (कह दो कि अल्लाह एक है)। यह सूरत अल्लाह की तौहीद (एकता) का सबसे बड़ा सबूत है।
सूरह कौसर: इन्ना आतैनाकल् कौसर… (बेशक हमने आपको कौसर अता की)। यह कुरान की सबसे छोटी और फजीलत वाली सूरत है।
सूरह नास: वसवसों और बुराइयों से बचने के लिए यह आखिरी सूरत पढ़ना सुन्नत है।