जानबूझकर रोज़ा ना रखना कितना बड़ा गुनाह है? जानिए इस्लामिक हुक्म
रमज़ान का महीना अल्लाह की रहमतों और बरकतों का महीना होता है, जिसमें हर मुसलमान पर रोज़ा रखना फ़र्ज़ है। लेकिन अगर कोई इंसान बिना किसी शरई वजह के जानबूझकर रोज़ा नहीं रखता, तो यह इस्लाम में एक बेहद संगीन गुनाह माना गया है। कुरान की सूरह अल-बक़रा की आयत 183 में अल्लाह ने साफ तौर पर फरमाया है कि रोज़ा तुम पर वैसे ही फ़र्ज़ किया गया है जैसे तुमसे पहले लोगों पर किया गया था, ताकि तुम परहेज़गार बनो।
हदीसों के मुताबिक, अगर कोई शख्स रमज़ान का एक भी रोज़ा बिना किसी रुख्सत और बिना किसी बीमारी के छोड़ देता है, तो वह सारी उम्र रोज़े रखे तब भी उस एक रोज़े का बदला नहीं चुका सकता। यानी जानबूझकर रोज़ा ना रखना सिर्फ एक इबादत को छोड़ना नहीं, बल्कि अल्लाह की खुली नाफरमानी है, जिसका अंजाम आख़िरत में बहुत सख़्त हो सकता है।
इस्लाम में सिर्फ उन्हीं को छूट दी गई है जो सफर में हों, गंभीर बीमारी में हों, गर्भवती या दूध पिलाने वाली महिलाएं हों या उम्रदराज़ लोग जिन्हें रोज़ा रखने से जान का खतरा हो। लेकिन आलसीपन, दुनियादारी या बहानेबाज़ी के चलते रोज़ा ना रखना, न सिर्फ गुनाह है बल्कि अल्लाह के ग़ज़ब को दावत देने जैसा है।