अलविदा जुमा (Jumat-ul-Wida) का क्या है धार्मिक महत्व? क्यों भारी मन से नमाजी कहते हैं इसे ‘अलविदा‘
रमजान के महीने का हर दिन बरकतों से भरा होता है, लेकिन आखिरी शुक्रवार को एक अलग ही रूहानी सुकून महसूस किया जाता है। इसे ‘अलविदा जुमा’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके बाद रमजान का कोई और शुक्रवार उस साल नहीं आता।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शुक्रवार (जुमा) को सप्ताह का सबसे श्रेष्ठ दिन माना गया है, और जब यह रमजान के पवित्र महीने में आता है, तो इसकी अहमियत कई गुना बढ़ जाती है। ‘अलविदा जुमा’ इस बात का प्रतीक है कि अब इबादत का यह खास महीना खत्म होने वाला है और ईद की खुशी आने वाली है। इस दिन मुसलमान सुबह से ही पाक-साफ होकर, नए कपड़े पहनकर मस्जिद की ओर रुख करते हैं। खुतबे में रमजान की अहमियत और विदाई का जिक्र होता है, जिसे सुनकर अक्सर नमाजियों की आंखें नम हो जाती हैं। यह दिन हमें सिखाता है कि समय का सदुपयोग इबादत और भलाई के कामों में करना चाहिए।