सहरी और इफ्तार: रूह की भूख मिटाने वाली रस्म और दुआएं
क्या आपने कभी गौर किया है कि तपती दोपहर में प्यास लगने के बावजूद एक रोज़ेदार पानी की बूंद को हाथ क्यों नहीं लगाता? यह खौफ नहीं, बल्कि उस खुदा के प्रति बेइंतहा मोहब्बत है। रमज़ान की ठंडी सुबह (सहरी) और बरकत वाली शाम (इफ्तार) के बीच का जो वक्त है, वह इंसान के सब्र का इम्तिहान है।
रोज़ा रखने की दुआ (सहरी की नीयत):
सहरी खाने के बाद यह दुआ पढ़ना मुस्तहब है:
“व बि सोमि गदिन नवय्तु मिन शहरि रमज़ान”
तर्जुमा: और मैंने रमज़ान के कल के रोज़े की नीयत की।
रोज़ा खोलने की दुआ (इफ्तार के वक्त):
दिन भर की भूख-प्यास के बाद जब दस्तरख्वान सजता है, तो यह दुआ पढ़ें:
“अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुम्तु व बिका आमन्तु व अलैका तवक्कलतु व अला रिज़क़िका अफ्तरतु”
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मैंने तेरे ही लिए रोज़ रखा, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया और तेरे ही दिए हुए रिज़्क से इफ्तार किया।