विशेष रिपोर्ट: आखिर क्यों विपक्ष ने चला ‘अविश्वास प्रस्ताव’ का दांव? संसद में सरकार को घेरने की बड़ी रणनीति का खुलासा
रिपोर्ट: अज़हर मलिक
दिनांक: 11 फरवरी, 2026
नई दिल्ली: संसद का बजट सत्र अब केवल आंकड़ों की बाजीगरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक पूर्ण राजनीतिक युद्ध का मैदान बन चुका है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर विपक्ष ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी रणनीति अब केवल ‘बहिष्कार’ (Walkout) तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सीधे संवैधानिक पदों की निष्पक्षता को चुनौती देकर सरकार को बैकफुट पर धकेलना चाहता है।
1. आक्रामक रुख: रक्षात्मक से हमलावर हुई विपक्षी एकता
अज़हर मलिक की विशेष पड़ताल के अनुसार, विपक्षी गठबंधन ने इस बार ‘एकजुटता’ को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है। बजट सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष का आरोप रहा है कि उनकी आवाज को दबाया जा रहा है। अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देना इस बात का संकेत है कि राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता अब सदन के भीतर किसी भी समझौते के मूड में नहीं हैं।
2. रणनीति का मुख्य हिस्सा: जनता के बीच ‘विक्टिम कार्ड’
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विपक्ष जानता है कि संख्या बल (Numbers) के हिसाब से अविश्वास प्रस्ताव को पारित कराना मुश्किल है। लेकिन विपक्ष की असली रणनीति सदन जीतना नहीं, बल्कि जनता की सहानुभूति जीतना है। वे यह संदेश देना चाहते हैं कि “लोकतंत्र के मंदिर” में उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, जिससे सरकार की छवि एक ‘तानाशाह’ के रूप में पेश की जा सके।
3. बजट से ध्यान भटकाने की कोशिश?
सत्ता पक्ष का आरोप है कि विपक्ष जानबूझकर यह हंगामा कर रहा है ताकि सरकार द्वारा बजट में की गई जनकल्याणकारी घोषणाओं पर चर्चा न हो सके। वहीं, विपक्ष की रणनीति यह है कि बजट की खामियों को उजागर करने के साथ-साथ ‘संसदीय गरिमा’ के मुद्दे को इतना बड़ा बना दिया जाए कि सरकार को जवाब देना भारी पड़ जाए।
4. ‘संवैधानिक संकट’ पैदा करने का दांव
अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव लाकर विपक्ष ने एक तकनीकी पेंच फंसा दिया है। जब तक इस प्रस्ताव पर चर्चा और वोटिंग नहीं हो जाती, तब तक सदन की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहेंगे। विपक्ष का लक्ष्य सरकार को घेरकर उसे मजबूर करना है कि वह विपक्ष की मांगों (जैसे विशेष चर्चा या जेपीसी की मांग) के आगे झुके।
अज़हर मलिक का विश्लेषण:
विपक्ष का यह कदम केवल एक नोटिस नहीं, बल्कि 2026-27 के आगामी चुनावों की तैयारी का शंखनाद है। यदि विपक्ष इस मुद्दे पर अडिग रहता है, तो आने वाले दिनों में संसद की कार्यवाही पूरी तरह ठप हो सकती है, जिसका सीधा असर देश की विधायी प्रक्रियाओं पर पड़ेगा।