प्रयागराज, जहाँ तीन नदियों का मिलन होता है, जहाँ की मिट्टी में साधना की महक है और जहाँ की गलियों में इतिहास सांस लेता है। लेकिन इन सब के बीच एक और संगम यहाँ सदियों से होता आया है—वह है प्रेम और त्याग का संगम। सिविल लाइंस की कॉफी हाउस से लेकर नैनी ब्रिज की ठंडी हवाओं तक, यहाँ की हवा में एक ऐसी प्रेम कहानी दफन है, जिसने न जाने कितने दिलों को धड़कना सिखाया।
यह कहानी शुरू होती है इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उसी ऐतिहासिक लाइब्रेरी से, जहाँ किताबों की खुशबू के बीच दो अनजान नजरें मिलीं। वह एक गंभीर छात्र था जो पीएससी की तैयारी में दिन-रात एक किए हुए था, और वह, कला की एक ऐसी साधिका जिसकी पेंटिंग्स में प्रयागराज के घाट जिंदा हो उठते थे। उनका प्रेम किसी फिल्मी शोर-शराबे जैसा नहीं था, बल्कि गंगा की गहराई जैसा शांत और गंभीर था।
वक्त बीता, वादे हुए, लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। सामाजिक बेड़ियों और पारिवारिक मर्यादाओं के बीच यह प्रेम कहानी एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई जहाँ चुनाव करना असंभव था। संगम की रेती पर हाथ में हाथ डालकर की गई वो कसमें, नैनी ब्रिज से डूबते सूरज को देखने की वो आदतें, सब कुछ एक झटके में ओझल होने लगा। उस आखिरी शाम, जब यमुना की लहरें उफान पर थीं, उन्होंने तय किया कि भले ही वे साथ न रह सकें, लेकिन उनका प्रेम इस पवित्र नगरी की कहानियों में हमेशा अमर रहेगा।
आज भी लोग कहते हैं कि जब कुंभ के मेले में लाखों की भीड़ उमड़ती है, तो कहीं न कहीं दो बुजुर्ग आंखें आज भी एक-दूसरे को तलाशती हैं। प्रयागराज की यह प्रेम कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम का मतलब हमेशा पा लेना नहीं होता, कभी-कभी प्रेम का असली अर्थ ‘स्मृति’ बन जाना भी होता है। संगम की लहरें आज भी उन अनकहे शब्दों को सुनाती हैं जो उस समय कहे गए थे जब दो दिल एक-दूसरे से विदा ले रहे थे।
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