काशीपुर: वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य सिस्टम, रेबीज के इंजेक्शन को तरसते गरीब और ‘लापता’ स्वास्थ्य मंत्री!
काशीपुर। उत्तराखंड के काशीपुर में स्वास्थ्य व्यवस्था की जो तस्वीर सामने आ रही है, वह न केवल डरावनी है बल्कि प्रदेश सरकार की संवेदनशीलता पर गहरा कलंक भी है। सड़कों पर बेलगाम घूमते आवारा कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि हर दिन मासूम बच्चे और बुजुर्ग इनका शिकार बन रहे हैं, लेकिन सरकारी अस्पताल की दहलीज पर पहुँचते ही इन मरीजों का पाला ‘व्यवस्था की मौत’ से पड़ता है। काशीपुर के सरकारी अस्पतालों में लंबे समय से एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) का अकाल पड़ा है। आलम यह है कि अस्पताल पहुँचने वाले गरीब मरीजों को बेरहमी से टरका दिया जा रहा है। जिनके पास थोड़े पैसे हैं, वे भारी भरकम रकम खर्च कर निजी मेडिकल स्टोर से इंजेक्शन ला रहे हैं, लेकिन उन लाचार गरीबों का क्या, जो दाने-दाने को मोहताज हैं?
हृदयविदारक स्थिति तो यह है कि महंगाई की मार झेल रहे गरीब मरीज अब अस्पताल में चार-चार लोगों का समूह बनाकर एक ही वायल (Vial) शेयर करने को मजबूर हैं, ताकि किसी तरह उनकी जान बच सके। क्या एक प्रगतिशील राज्य में जनता को अपनी जान बचाने के लिए इस तरह की ‘भीख’ मांगनी पड़ेगी? सरकारी रिकॉर्ड में भले ही स्वास्थ्य सेवाएं ‘चकाचक’ दिखाई जा रही हों, लेकिन धरातल पर ऊधम सिंह नगर की स्वास्थ्य व्यवस्था खुद वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें गिनती नजर आ रही है।
सवालों के घेरे में स्वास्थ्य मंत्री: धन सिंह रावत जी, क्या इन गरीबों की चीखें आप तक नहीं पहुँचतीं?
इस पूरे संकट ने प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत की कार्यप्रणाली को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है।
क्या स्वास्थ्य विभाग को बढ़ते रेबीज के मामलों का अंदाजा नहीं था, या फिर जानबूझकर फाइलों में आपूर्ति को दबाया जा रहा है?
मंत्री जी, जब काशीपुर का गरीब अपनी जेबें खाली कर निजी अस्पतालों की ओर भाग रहा है, तब आपके विभाग के दावों की दवाएं कहाँ लुप्त हैं?
कभी मांग से कम आपूर्ति, तो कभी हफ्तों तक जीरो स्टॉक—क्या यह मिस-मैनेजमेंट नहीं बल्कि प्रशासनिक हत्या का प्रयास है?
जनता पूछ रही है कि जब सरकारी अस्पताल में एक इंजेक्शन उपलब्ध कराने की हैसियत विभाग की नहीं है, तो फिर बड़े-बड़े विज्ञापनों और ‘आयुष्मान’ के दावों का क्या अर्थ? अगर समय रहते काशीपुर को रेबीज के इंजेक्शन मुहैया नहीं कराए गए, तो किसी मासूम की मौत की जिम्मेदारी सीधे तौर पर स्वास्थ्य मंत्रालय की होगी।



