तराई पष्चिमी डिवीजन संवेदनशील रेंजों में बढ़ती आपराधिक घटनाएं वन विभाग में स्टाफ की भारी कमी भी एक बड़ी वजह या कुछ और ?

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तराई पष्चिमी डिवीजन संवेदनशील रेंजों में बढ़ती आपराधिक घटनाएं वन विभाग में स्टाफ की भारी कमी भी एक बड़ी वजह या कुछ और ?

                        सलीम अहमद साहिल 

 

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तराई पश्चिमी डिवीजन रामनगर की संवेदनशील वन रेंज एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। सिमटते जंगल, बढ़ती अवैध गतिविधियां और वन संपदा पर लगातार हो रहे हमले अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहे, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और विभागीय अव्यवस्था की ओर भी इशारा कर रहे हैं।

अवैध खनन और अवैध पातन को लेकर वन विभाग हमेशा से ही जनता के निशाने पर रहा है। आमजन इसे विभागीय मिलीभगत का नाम देते हैं, जबकि विभाग अक्सर इन घटनाओं को निचले स्तर के कर्मचारियों की लापरवाही बताकर कार्रवाई का दायरा वहीं सीमित कर देता है। लेकिन आज हम जिस पहलू की बात कर रहे हैं, वह कहीं ज्यादा गंभीर और चिंताजनक है।

रामनगर रेंज: संवेदनशीलता के बावजूद स्टाफ संकट ?

तराई पश्चिमी डिवीजन की रामनगर रेंज को अति संवेदनशील माना जाता है। यह रेंज वर्षों से अवैध खनन और अवैध पातन के मामलों में सुर्खियों में रही है। वर्तमान स्थिति यह है कि रामनगर रेंज भारी स्टाफ कमी से जूझ रही है।

एक ओर कुछ वन आरक्षी और वन दरोगा ऐसे हैं, जो एक से अधिक बीटों का चार्ज संभालते हुए दिन-रात जंगल की निगरानी में जुटे हैं। सीमित संसाधनों और दबाव के बावजूद ये कर्मचारी अवैध कटान और खनन रोकने के लिए पूरी मुस्तैदी से डटे हुए हैं।

 

आदेशों की खुली अवहेलना, जंगल भगवान भरोसे।

 

वहीं दूसरी ओर, स्थिति का एक कड़वा सच यह भी है कि कुछ वन आरक्षी ऐसे हैं जिन्हें प्रभाग स्तर से स्पष्ट रामनगर रेंज कि बीटो मे कार्यभार सभालने के स्पष्ट आदेश मिलने के बावजूद बीटों का कार्यभार नहीं सभाल रहे है। वे उन आदेशों को खुलेआम नजरअंदाज कर रहे हैं। जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, वही कंधे जिम्मेदारी उठाने से बचते नजर आ रहे हैं।

जंगलों की हिफाजत के लिए मिलने वाली सरकारी तनख्वाह के बावजूद, कुछ कर्मचारियों का रवैया यह दर्शाता है कि वे वन विभाग की नौकरी को जवाबदेही नहीं, बल्कि निजी जागीर समझ बैठे हैं। ऐसे लापरवाह कर्मचारियों को न तो जंगलों की चिंता है और न ही वन्य संपदा के भविष्य की।

 

माफियाओं को मिल रहा सीधा फायदा

 

स्टाफ की कमी और जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता का सीधा फायदा लकड़ी तस्करों और खनन माफियाओं को मिल रहा है। हाल के दिनों में ज्वाला वन, गुलजारपुर, जुड़का और दक्षिणी लोअर कोसी बीट में अवैध पातन और खनन की घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

ताजा मामला दक्षिणी लोअर कोसी बीट का है, जहां तस्करों ने सागौन के कीमती पेड़ों को निशाना बनाया। हालांकि, ड्यूटी पर तैनात सजग और ईमानदार वन कर्मियों ने तस्करों के मंसूबों को नाकाम करते हुए काटी गई सागौन की अवैध लकड़ी बरामद कर जुड़का वन चौकी में सुरक्षित रखवा दी।

 

ईमानदारी बनाम लापरवाही: विभाग के सामने बड़ा सवाल ?

 

अब बड़ा सवाल यह है कि जब रामनगर जैसी संवेदनशील रेंज में अवैध गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं, तो क्या विभाग उन कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई करेगा जो प्रभागीय वनाधिकारी के आदेशों को हवा में उड़ा रहे है। जो वन आरक्षी प्रभाग स्तर से पारित आदेशों का पालन नहीं कर रहे, वे न केवल विभागीय अनुशासन को ठेंगा दिखा रहे हैं, बल्कि जंगलों को अपराधियों के हवाले करने के दोषी भी हैं। ऐसे कर्मचारियों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है।

 

वहीं दूसरी ओर, जो कर्मचारी सीमित संसाधनों के बावजूद ईमानदारी और निष्ठा से अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं, क्या उन्हें विभागीय स्तर पर संरक्षण, प्रोत्साहन और सम्मान मिलेगा?

यह सवाल केवल वन विभाग का नहीं, बल्कि जंगलों के भविष्य और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का भी है। आने वाला वक्त ही बताएगा कि विभाग लापरवाह कर्मचारियों पर सख्त कार्यवाही करता है या नहीं और ईमानदार कर्मियों का हौसला बढ़ाकर जंगलों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। या फिर स्थिति जस कि तस बनी रहेगी।

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