एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनभर से अधिक खैर के हरे पेड़ों को पतरामपुर रेंज में रेंजर की सह पर धराशायी किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। सामने आई ताज़ा तस्वीरें और भी भयावह हैं।

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एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनभर से अधिक खैर के हरे पेड़ों को पतरामपुर रेंज में रेंजर की सह पर धराशायी किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। सामने आई ताज़ा तस्वीरें और भी भयावह हैं।

                        सलीम अहमद साहिल 

 

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तराई पश्चिमी डिवीजन, रामनगर की पतरामपुर रेंज में भ्रष्टाचार किस कदर चरम पर है, यह बताने के लिए ये तस्वीरें ही काफी हैं, जो पतरामपुर के जंगलों से निकलकर सामने आई हैं। यहां एक पेड़ नहीं, दो पेड़ नहीं, चार पेड़ नहीं, बल्कि दर्जन से अधिक बेशकीमती खैर के हरे पेड़ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। तस्करों के हौसले इतने बुलंद हैं कि पहले हरे पेड़ों पर आरी चलाई जा रही है, फिर उन पेड़ों के ठूंठों को कुल्हाड़ी से काटकर जमींदोज करने का प्रयास किया जा रहा था।

 

 

लेकिन THE GREAT NEWS पर खबर प्रकाशित होने के बाद तस्करों ने अपना तस्करी का पैटर्न बदल लिया है। अब तस्कर पेड़ों के ठूंठों को आग के हवाले कर सबूत मिटाने में जुट गए हैं। इसके बावजूद माकोनियां बीट के कृपाचार्यपुर में तैनात फॉरेस्ट गार्ड और वन दरोगा दोनों अपनी वर्दी के नशे में चूर नजर आ रहे हैं। जंगलों में चाहे कितनी भी गंभीर और आपराधिक घटनाएं घटित हों, जंगल खुलेआम लुट रहे, लेकिन फॉरेस्ट गार्ड और वन दरोगा को कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे भी अधिक गंभीर बात ये है कि रेंजर महेश सिंह बिष्ट जिनके कंधो पर रेंज को सुरक्षित करने का जिम्मा है। किसी तस्कर पर कार्यवाही करने के बजाय वो पूरी मुस्तैदी के साथ भ्रष्ट तंत्र को संरक्षण दे रहे हैं। बेशकीमती वन संपदा को धड़ल्ले से बर्बाद किया जा रहा है।

 

 

तराई पश्चिमी डिवीजन, रामनगर की पतरामपुर रेंज इन दिनों लकड़ी तस्करों की सुरक्षित पनाहगाह बन चुकी है। यह पनाहगाह तस्करों के लिए कितनी सुरक्षित है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दर्जन से अधिक खैर के हरे पेड़ों को तस्करों द्वारा जमींदोज कर दिया गया है, जिनकी तस्वीरें अब सामने आ चुकी हैं। विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि अवैध कटान का यह सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं है। आने वाले दिनों में इस गोरखधंधे से जुड़ी और भी बड़ी संख्या में भयावह तस्वीरें सामने आने की प्रबल संभावनाएं बनी हुई हैं।

 

तस्वीरें चाहे कितनी भी भयावह क्यों न हों, पर्यावरण को कितना भी नोचकर लहूलुहान किया जा रहा हो, खैर के हरे-भरे जंगल खुलेआम लुट रहे हों, लेकिन रेंजर महेश सिंह बिष्ट खुद को इस वन्य सम्पदा को अपनी जागीर समझ बैठे है और खुद को रेंज का सेवक नहीं पूरी रेंज का मालिक बन बैठे हैं। रेंजर साहब जो कहे हो हुक्म और जो करें वो इंसाफ माना जाता है किसी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं दिखाई देती कि वह जंगल के कत्लेआम के मामले में रेंजर साहब से जवाब तलब कर सके। जंगलों की अस्मिता को तस्कर नोच-नोचकर पैसा कमा रहे हैं और रेंजर महेश सिंह बिष्ट की कार्यप्रणाली तथा उनकी रहस्यमयी चुप्पी ने विभाग की कथित ईमानदारी पर गहरा कलंक लगा दिया है।

 

 

माकोनियां बीट के कृपाचार्यपुर क्षेत्र से खैर के दर्जन भर हरे पेड़ों के अवैध कटान की जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे रोंगटे खड़े करने वाली हैं। इन तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि बेशकीमती खैर के हरे पेड़ों को तस्करों द्वारा दिनदहाड़े आरी से काटा जा रहा है और सबूत मिटाने के लिए पेड़ों के ठूंठों को कुल्हाड़ी से खोदकर जमीन में दफन किया जा रहा है। कई ठूंठों में आग भी लगाई जा रही है, अगर जांच हो तो कोई सबूत या कोई निशान तक न बचे।

 

विश्वसनीय सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों का स्पष्ट आरोप है कि जब से रेंजर महेश सिंह बिष्ट ने पतरामपुर रेंज का कार्यभार संभाला है, तब से तस्करी की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। आरोप है कि रेंजर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ मिलकर तस्करो के पूरे सिंडिकेट को संरक्षण दे रहे हैं।

 

जब छोटे कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं, तो जनता बड़े अधिकारियों से कार्रवाई की उम्मीद करती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि विभाग के उच्च पदों पर बैठे अधिकारी, विशेषकर उप प्रभागीय वनाधिकारी संदीप गिरी, जिन्हें कभी तेजतर्रार अधिकारियों में गिना जाता था और जिनके कंधों पर तराई पश्चिमी डिवीजन, वन प्रभाग रामनगर की चार रेंजों की जिम्मेदारी है, उनकी चुप्पी अब उनकी कार्यशैली पर भी सवालिया निशान खड़े कर रही है। उप प्रभागीय वनाधिकारी के कार्यकाल में रेंजर की मनमानी और तस्करों का राज चरम पर है।

 

 

अब सवाल यह उठता है कि क्या संदीप गिरी का अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो चुका है, या फिर वे खैर के हरे पेड़ों पर चल रही आरी और सबूतों को जमींदोज किए जाने की इस पूरी प्रक्रिया से भली-भांति परिचित हैं और जानबूझकर खामोशी साधे हुए हैं? या फिर इस पूरे सिंडिकेट का रसूख इतना बढ़ चुका है कि संदीप गिरी के हाथ भी तस्करों और इस गंभीर प्रकरण के जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों के गिरेबान तक पहुंचने में कांप रहे हैं।

 

फिलहाल हालात चाहे जैसे भी हों, सच्चाई यही है कि जंगलों की अस्मिता पर आरी चल रही है। तस्कर मालामाल हो रहे हैं, जंगल खत्म हो रहे हैं, पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है, राज्य सरकार को लाखों रुपये के राजस्व का चुना लग रहा है और जिम्मेदार अधिकारी रहस्यमयी खामोशी ओढ़े बैठे हैं।

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