क्या तराई के रक्षकों की लापरवाही ने ली ‘गजराज’ की जान? तिलपुरी के जंगलों में खामोश हुई एक गूँज

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क्या तराई के रक्षकों की लापरवाही ने ली ‘गजराज’ की जान? तिलपुरी के जंगलों में खामोश हुई एक गूँज

 

 

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जंगल का वो राजा, जिसकी एक चिंघाड़ से पूरी तराई कांप उठती थी, शनिवार की सुबह पीपल पड़ाव रेंज के तिलपुरी गाँव में मिट्टी के ढेर की तरह बेजान पड़ा मिला। सवाल यह नहीं है कि हाथी की मौत हुई, सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक मौत है या वन विभाग की उस कार्यप्रणाली पर गहरा तमाचा, जो दावों की फाइलों में तो दुरुस्त है, लेकिन धरातल पर दम तोड़ रही है?

 

 

सस्पेंस इस बात का नहीं है कि हाथी क्यों मरा, बल्कि गहरा रहस्य इस बात में छुपा है कि आधुनिक तकनीक और गश्त के बड़े-बड़े दावों के बीच एक विशालकाय वन्यजीव की मौत हो गई और विभाग को इसकी खबर तक नहीं लगी। जब ग्रामीणों ने शोर मचाया, तब जाकर कुंभकर्णी नींद में सोया महकमा जागा और आनन-फानन में इलाके की घेराबंदी शुरू की गई। आखिर ऐसा क्या था जिसे छिपाने के लिए अधिकारियों ने पूरे क्षेत्र को आनन-फानन में सील कर दिया?

 

 

तराई केंद्रीय वन प्रभाग रुद्रपुर डिवीजन के अंतर्गत गदरपुर क्षेत्र में आने वाली पीपल पड़ाव रेंज एक बार फिर विवादों के घेरे में है। हाथी का संदिग्ध परिस्थितियों में मृत मिलना विभाग की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल रहा है। एसडीओ शशि देव सिंह और रेंज अधिकारी पूरनचंद जोशी की मौजूदगी में की जा रही जांच पर अब उंगलियां उठने लगी हैं। ग्रामीणों में चर्चा है कि अगर विभाग मुस्तैद होता, तो शायद यह नौबत न आती। डीएफओ उमेश चंद तिवारी भले ही बीमारी या आपसी संघर्ष का हवाला देकर मामले को शांत करने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन विभाग की यह ‘डैमेज कंट्रोल’ वाली मुद्रा उसकी गंभीरता पर सवालिया निशान लगाती है। क्या यह महकमे की नाकामी नहीं है कि जिस क्षेत्र में उनकी तैनाती है, वहां मौत का तांडव मच गया और उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी?

वर्तमान में वन विभाग ने पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया है और साक्ष्यों को सहेजने का दावा किया जा रहा है। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन अक्सर ऐसी रिपोर्टों में विभाग अपनी कमियों को ढंकने के लिए तकनीकी शब्दों का सहारा लेता है। तिलपुरी के ग्रामीण अब दहशत और गुस्से में हैं। उनका कहना है कि वन विभाग केवल घटना के बाद ‘सतर्कता’ बरतने की सलाह देता है, जबकि असली जरूरत घटना को रोकने की थी। यह घटना स्पष्ट करती है कि रुद्रपुर डिवीजन में वन्यजीवों की सुरक्षा केवल कागजी घोड़ों तक सीमित रह गई है। जब तक पोस्टमार्टम की अंतिम रिपोर्ट आती है, तब तक विभाग के पास खुद को पाक-साफ साबित करने की चुनौती बनी रहेगी, लेकिन जनता की अदालत में वन विभाग की साख इस बेजान हाथी के साथ ही धराशायी हो चुकी है।

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