गैस की आग या सियासत का उबाल? नाले से चाय और ‘ट्रंप’ के साये में सुलगता रामनगर
सलीम अहमद साहिल
जब सड़कों पर धुआं उठने लगे और फिजाओं में सरकार विरोधी नारों की गूंज सुनाई दे, तो समझ लीजिए कि आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ चुका है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रामनगर की सड़कों पर अचानक एक पूर्व विधायक गंदे नाले में गैस पाइप डालकर चाय बनाने की जद्दोजहद क्यों करने लगे? यह कोई सामान्य दृश्य नहीं था, बल्कि एक तीखा कटाक्ष था उस ‘पाइपलाइन’ वाले वादे पर, जो आज महंगाई के बोझ तले दब चुका है। पूर्व विधायक रणजीत रावत के नेतृत्व में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का यह हुजूम महज एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस बढ़ती बेबसी का शोर था, जो ₹60 की ताजा बढ़ोतरी के बाद हर घर की दहलीज पार कर चुकी है।
सवाल सिर्फ सिलेंडर की किल्लत का नहीं है, सवाल उस नीतिगत लाचारी का है जिसने भारतीय चूल्हों की चाबी सात समंदर पार बैठे उन ताकतों के हाथ में थमा दी है, जिनके इशारों पर आज देश की विदेश नीति और तेल की कीमतें नाचती हुई प्रतीत हो रही हैं।
रामनगर के रानीखेत रोड पर जब ‘सदन से नरेंद्र गायब, किचन से सिलेंडर गायब’ जैसे नारे गूंजे, तो सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसर गया। रणजीत रावत ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक ऐसी कूटनीतिक साजिश की ओर इशारा किया, जिसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा कि आज देश का स्वाभिमान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की ‘एप्सटिन फाइल’ और उनके दबाव के बीच कहीं खो गया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है कि भारत जैसा संप्रभु राष्ट्र किससे तेल खरीदेगा और किससे नहीं, इसका फैसला अब व्हाइट हाउस से हो रहा है। सरकार की इसी घुटने टेकने वाली नीति का नतीजा है कि आज देश की महिलाएं महंगा तेल और गैस खरीदने को मजबूर हैं, जबकि सरकार ‘अच्छे दिनों’ का छलावा देकर असल मुद्दों से मुंह मोड़ चुकी है।
प्रदर्शन के दौरान जिस तरह से प्रधानमंत्री के पुराने ‘गैस बनाने के फॉर्मूले’ का मजाक उड़ाते हुए नाले की गैस से चाय बनाने की कोशिश की गई, उसने भाजपा सरकार के दावों की कलई खोलकर रख दी। कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक रसोई से बढ़ा हुआ यह आर्थिक बोझ कम नहीं होता और विदेशी हस्तक्षेप बंद नहीं होता, तब तक यह जंग सड़कों से लेकर सदन तक जारी रहेगी। इस आक्रोश में भुवन शर्मा, देशबंधु रावत, अनिल अग्रवाल और ललिता उपाध्याय समेत सैकड़ों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि जनता अब ‘पुराने दिनों’ की वापसी चाहती है, क्योंकि ‘न्यू इंडिया’ के नाम पर मिल रही महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। क्या सरकार इस तीखे वार का जवाब दे पाएगी या फिर महंगाई की यह आग आने वाले चुनाव में सत्ता की कुर्सी को झुलसा देगी?



