ऊंट के मुँह में जीरा जैसी कार्रवाई, मगर रेंजर गदगद— जंगल कटते रहे, कुर्सियाँ बचती रहीं। खैर की लूट, जंगलों की चीख और रेंजर की चुप्पी— पतरामपुर रेंज की शर्मनाक कहानी।

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ऊंट के मुँह में जीरा जैसी कार्रवाई, मगर रेंजर गदगद— जंगल कटते रहे, कुर्सियाँ बचती रहीं। खैर की लूट, जंगलों की चीख और रेंजर की चुप्पी— पतरामपुर रेंज की शर्मनाक कहानी।

                   सलीम अहमद साहिल 

 

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पतरामपुर में उजड़ा जंगल, सवाल उठे तो रेंजर महेश सिंह बिष्ट की खिसयाहट सड़क पर आ गई

पतरामपुर रेंज में इस वक्त लकड़ी तस्करी का कैसा नंगा नाच चल रहा है, यह किसी से छुपा नहीं है। तस्करों के रसूख के आगे—या यूँ कहिए तस्करों के पैसों की चमक के आगे—वन विभाग की आँखों पर जैसे काली पट्टी बंधी हुई है। लकड़ी तस्करी के बड़े मगरमच्छों तक वन विभाग के हाथ पहुँचने मे काँपते नज़र आ रहे हैं।

आज एक खबर सामने आई, जिसका प्रेस नोट और कुछ तस्वीरें व्हाट्सएप ग्रुपों में तैर रही हैं। प्रेस नोट में लिखा गया है कि प्रभागीय वनाधिकारी तराई पश्चिमी वन प्रभाग एवं उप प्रभागीय वनाधिकारी जसपुर के निर्देशन में तथा वन क्षेत्राधिकारी दक्षिणी जसपुर के नेतृत्व में दिनांक 07/02/2025 को मुखबिर खास की सूचना पर गढ़ीनेगी–करनपुर मार्ग के बीच तीन मोटरसाइकिलों पर लदे 20 नग खैर के साथ दो आरोपियों को पकड़ा गया। आरोपियों को खैर और मोटरसाइकिल सहित दक्षिणी जसपुर परिसर में सुरक्षित लाया गया तथा अग्रिम वैधानिक कार्यवाही की जा रही है।

 

 

अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें खास क्या है?

तो आइए, आपको बताते हैं कि पूरा खेल क्या है और किस तरह रेंजर साहब अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए नाटकीय हरकतें कर रहे हैं। किस तरह प्रभागीय वनाधिकारी की मेहनत पर पानी फेरते हुए, ऊपर के अधिकारियों को खुश करने और अपने दामन को पाक-साफ दिखाने की कोशिश की जा रही है।

 

प्रेस नोट में जो लिखा गया है, वही वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

 

तीन मोटरसाइकिलों पर 20 नग खैर रखे होने की बात कही गई है। सवाल यह है कि उन लकड़ियों की गोलाई कितनी थी? वन विभाग आमतौर पर इतनी पतली लकड़ी को सोपता बताता है, जो जलाने के काम आती है। तो फिर साहब, यह कौन-सी बड़ी कार्रवाई हो गई?

 

रेंजर साहब, आपके राज में ये लकड़ी तस्कर इतने बेखौफ कैसे हो गए कि खैर की लकड़ी मोटरसाइकिलों पर लादकर खुलेआम सड़कों पर घूम रहे थे?

 

 

कहीं ऐसा तो नहीं कि मीडिया की नज़रें पतरामपुर रेंज की माकोनिया बीट के कृपाचार्यपुर पर टिकी हुई हैं, और इधर पूरी पतरामपुर रेंज में लकड़ी तस्करी का संगठित सिंडिकेट सक्रिय है, जो जंगलों को बेरहमी से उजाड़ रहा है?

 

जो खैर की लकड़ी पकड़ी गई, उसकी कीमत क्या थी—यह प्रेस नोट में क्यों नहीं बताया गया?

क्या कीमत उजागर करने से वन विभाग की और किरकिरी हो जाती?

माकोनिया बीट के कृपाचार्यपुर से 50 खैर के पेड़ तस्करी की भेंट चढ़ चुके हैं। मामला हाईलाइट हुआ तो क्या इसी वजह से यह पूरी फिल्मी स्क्रिप्ट रची गई?

रेंजर साहब, लकड़ी तस्करी के बड़े मगरमच्छ आपकी पहुँच से बाहर क्यों हैं?

 

क्या आपकी कार्रवाई सिर्फ छोटे-मोटे चिंद्दी चोरों तक ही सीमित है?

 

ऐसे अनेकों सवाल वन विभाग की साख को तार-तार कर रहे हैं, लेकिन क्या मजाल कि कोई अधिकारी रेंजर साहब को तलब कर 50 पेड़ों के अवैध कत्लेआम पर ठोस जवाब तलब करे या सख्त कार्रवाई करे।

 

जिन जंगलों को बचाने की कसम रेंजर साहब और उनके अधीनस्थों ने ट्रेनिंग के दौरान खाई होगी, उन्हीं जंगलों को बचाने के बदले सरकार से लाखों की तनख्वाह ली जा रही है। और आज उन्हीं जंगलों का कत्लेआम हो रहा है और रेंजर साहब के हाथ खैर की लकड़ियों से रंगे हुए नज़र आ रहे हैं।

छोटी-सी कार्रवाई दिखाकर पीठ थपथपाई जा रही है—ऐसी कार्रवाई को तो ऊंट के मुँह में जीरा भी नहीं कहा जा सकता —लेकिन साहब फिर भी गदगद हैं।

 

हालात ऐसे हैं कि पतरामपुर रेंज के जंगल बाहर से हरे-भरे दिखते हैं, लेकिन अंदर से पूरी तरह खोखले हो चुके हैं। जंगल चीख-चीखकर खुद को बचाने की गुहार लगा रहे हैं, मगर उनकी चीखें वहाँ तैनात वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी दवा रहे है या फिर जंगलो से लगे शहर और गाँव लोग पेड़ो के क़त्ल के गवाह तो है लेकिन वन विभाग से खौफ जदा है और पेड़ो की चीखो को जानबूझकर अनसुना किया जा रहा हैं।

 

 

पतरामपुर रेंज की भयावह हकीकत तभी सामने आएगी जब कोई उच्चस्तरीय समिति गठित कर पूरे रेंज की गहन कॉम्बिंग कराई जाएगी। लेकिन मौजूदा हालात देखकर तो यही लगता है कि रेंजर साहब के रसूख के सामने यह सब संभव नहीं।

 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भले ही जंगलों और पर्यावरण को बचाने के लिए प्रयासरत हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मुख्यमंत्री की साख को खुलेआम पलीता लगाया जा रहा है। और वन मंत्री सुबोध उनियाल, जिनके कंधों पर उत्तराखंड की वन संपदा की सुरक्षा की जिम्मेदारी है—या तो वो इन हालात से अनजान हैं, या फिर रेंजर साहब का रसूख उनसे भी ऊपर पहुँच चुका है।

 

फिलहाल देखने वाली बात यह होगी कि यह नाटकिया कार्रवाई कब तक चलती है और असली जमीन पर जांच व ठोस कार्रवाई कब होती है—यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

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