जंगल छोटा पड़ा या इंसान का खून हुआ सस्ता? रामनगर में आदमखोर की नई सल्तनत और बेबस खाकी का पहरा

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जंगल छोटा पड़ा या इंसान का खून हुआ सस्ता? रामनगर में आदमखोर की नई सल्तनत और बेबस खाकी का पहरा!

 

न घर की दहलीज़ सुरक्षित है, न दिन का उजाला और न ही अपनों का साथ। जब मौत झाड़ियों में छिपी अपनी पीली आँखों से आपको ताक रही हो, तो पैर घर से बाहर निकलते ही सिहरन पैदा कर देते हैं। उत्तराखंड के शांत पहाड़ और मैदानी तराई के इलाके इन दिनों एक ऐसे अदृश्य खौफ के साये में हैं, जिसकी आहट सुनाई नहीं देती, बस उसकी मौजूदगी का एहसास तब होता है जब कोई अपना हमेशा के लिए खामोश हो जाता है। जंगल के राजा का साम्राज्य अब बदल चुका है;

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अब उसकी सल्तनत पेड़ों के पीछे नहीं, बल्कि इंसानी बस्तियों के पिछवाड़े और खेतों की मेड़ों तक फैल गई है। यह कहानी किसी डरावनी फिल्म की नहीं, बल्कि देवभूमि के उस कड़वे सच की है जहाँ इंसान और जानवर के बीच का संघर्ष अब एक खूनी मोड़ ले चुका है।

तराई पश्चिमी डिवीजन के रामनगर अंतर्गत पतरामपुर बीट के तीरथ इलाके में पसरा सन्नाटा आज कुछ ज्यादा ही भारी है। यहाँ की हवाओं में एक मातम है और हर दिल में एक ही सवाल कि आखिर अगली बारी किसकी? बीती शाम जब एक कॉलेज जाने वाला नौजवान, जिसकी आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने थे, अपने घर के पास ही नित्य कर्म के लिए निकला था, उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि मौत चंद कदमों की दूरी पर घात लगाए बैठी है। पलक झपकते ही सन्नाटे को चीरती एक दहाड़ गूंजी और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, गुलदार ने उस युवक को अपना निवाला बना लिया। वह छात्र जो चंद घंटों पहले किताबों के बीच अपना करियर बुन रहा था, चंद मिनटों में महज़ एक खबर बनकर रह गया।

इस हृदयविदारक घटना ने वन महकमे की नींद उड़ा दी है। सूचना की आग जैसे ही फैली, डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य अपनी पूरी टीम के साथ मौके पर जा धमके। तीरथ बीट के चप्पे-चप्पे पर अब खाकी वर्दी का पहरा है और गश्त की रफ्तार तेज़ कर दी गई है, लेकिन ग्रामीणों के दिलों में घर कर चुके उस डर का क्या, जो हर आहट पर चौंक जाते हैं? पहाड़ों से लेकर मैदानों तक गुलदारों का यह बढ़ता दखल अब महज़ एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। जंगलों की सरहदें लांघकर आबादी के बीच अपनी पैठ बना चुके इन शिकारी जानवरों ने आम जनजीवन को बंधक बना लिया है। प्रशासन भले ही पिंजरों और गश्त के दावे कर रहा हो, लेकिन तीरथ की इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब तक ठोस रणनीति नहीं बनती, तब तक इंसान और गुलदार के इस खूनी खेल में मासूम जिंदगियां यूँ ही दांव पर लगती रहेंगी।

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