जंगल में तस्करों का राज या सिस्टम की मिलीभगत? वन विभाग की करनी का खामियाजा भुगतेगा वन निगम? पतरामपुर रेंज में एक और गजब कारनामा।

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जंगल में तस्करों का राज या सिस्टम की मिलीभगत? वन विभाग की करनी का खामियाजा भुगतेगा वन निगम? पतरामपुर रेंज में एक और गजब कारनामा।

                  सलीम अहमद साहिल

 

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तराई पष्चिमी डिवीजन की पतरामपुर रेंज अब मानो लकड़ी तस्करों की जागीर बन चुकी है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं रह गई है। अभी पतरामपुर रेंज की मकोनिया बीट के दाग रेंजर साहब के दामन से अभी धुले भी नहीं थे कि अब एक और गजब कारनामा सामने आ गया है। इस बार मामला पतरामपुर रेंज की मोहनगर मालधनचौड़ बीट के कंपार्टमेंट नंबर 38 से निकलकर सामने आया है, जो वन विभाग की कार्यप्रणाली और व्यवस्थाओं पर एक और बदनुमा धब्बा साबित हो रहा है।

 

 

दरअसल वर्ष 2025-26 में वन निगम के कटान के लिए पतरामपुर रेंज की मोहनगर मालधनचौड़ बीट के कंपार्टमेंट नंबर 38 में वन विभाग द्वारा सूखे साल के पेड़ों का छपान किया गया था। नियमानुसार छपान के बाद पेड़ों की सूची वन निगम को सौंपी गई ताकि निर्धारित पेड़ों का कटान किया जा सके। लेकिन जब यह सूची वन निगम के अधिकारियों तक पहुँची और निगम के अधिकारीयो और कर्मचारियों ने मौके पर जाकर पेड़ों की भौतिक गणना की, तो जो सच्चाई सामने आई उसने पूरे मामले की परतें खोल दीं। भौतिक गणना के दौरान पाया गया कि सूची में दर्ज लगभग एक दर्जन साल के पेड़ मौके से गायब हैं। इन पेड़ों को लकड़ी तस्कर पहले ही धराशायी कर ठिकाने लगा चुके हैं।

 

 

साल के पेड़ों के अवैध कटान का मामला सामने आने के बाद वन निगम ने मोहनगर मालधनचौड़ के कंपार्टमेंट नंबर 38 की लॉट काटने से साफ इंकार कर दिया। निगम इस पूरे प्रकरण में वन विभाग की लापरवाही और संभावित अनियमितताओं का दाग अपने सिर लेने को तैयार नहीं था। लेकिन जैसे ही वन विभाग को यह महसूस हुआ कि अवैध कटान की यह आग अब सीधे उनकी कुर्सी तक पहुँच सकती है तो विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के हाथ-पांव फूल गए। बताया जा रहा है कि वन निगम पर दबाव बनाकर आखिरकार 1 मार्च से कंपार्टमेंट नंबर 38 में कटान शुरू करवा दिया गया।

यहीं से पूरा मामला और अधिक संदेह के घेरे में आ गया है। क्योंकि जिस सूची के आधार पर कटान होना है। उसमें दर्ज करीब एक दर्जन पेड़ तो तस्कर पहले ही साफ कर चुके हैं। ऐसे में अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि वन निगम अपना आउटन आखिर कैसे पूरा करेगा? अगर आउटन पूरा नहीं हुआ तो उसकी भरपाई कौन करेगा वन विभाग या वन निगम?

क्या इन गायब पेड़ों का हिसाब कागजों में ही पूरा कर दिया जाएगा या फिर आउटन पूरा करने के नाम पर ऐसे पेड़ों पर भी आरी चलवा दी जाएगी जिनका न तो छपान हुआ और न ही वन निगम को दी गई सूची में उनका कोई जिक्र है?

 

क्या वन दरोगा गणेश जोशी और फारेस्ट गार्ड के भ्रस्टाचार को छिपाने के लिए ऐसे पेड़ों के गर्दन पर आरी चलेगी जिनका जिक्र कटान की लिस्ट मे नहीं है सीदे शब्दों मे कहे तो एक भ्रस्टाचार को छुपाने के लिए दूसरा भ्रस्टाचार किया जायगा?

 

यह तो उन पेड़ों का मामला है जो छपान के बाद तस्करी की भेंट चढ़ गए और निगम की भौतिक गणना मे मामला उजागर हो गया। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जंगल के अंदर ऐसे कितने और साल के पेड़ होंगे जिन्हें तस्करो ने अपना निशाना बनाया होगा और इस बात की जानकारी वन दरोगा गणेश जोशी और फॉरेस्ट गार्ड को होगी लेकिन निगम का उन पेड़ों से कोई सरोकार नहीं था तो उसने उन पेड़ों के अवैध कटान पर ध्यान नहीं दिया होगा? अगर पूरे क्षेत्र में गंभीरता से कॉम्बिंग कराई जाए तो अवैध कटान की संख्या बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

मोहनगर मालधनचौड़ के कंपार्टमेंट नंबर 38 में जंगल की सुरक्षा का जिम्मा वन दरोगा गणेश जोशी और फॉरेस्ट गार्ड को सौंपा गया है। ऐसे में यह सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब भारी-भरकम साल के पेड़ काटे जा रहे थे तब जिम्मेदार अधिकारी आखिर कहां थे। क्या उन्हें इस पूरे घटनाक्रम की भनक तक नहीं लगी या फिर जंगल के अंदर चल रहे इस खेल से उन्होंने जानबूझकर आंखें मूंद रखी थीं?

पतरामपुर रेंज में लगातार सामने आ रहे अवैध कटान के मामले यह बताने के लिए काफी हैं कि जंगल कहीं न कहीं तस्करों के रहमोकरम पर है। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या रेंजर महेश सिंह बिष्ट पतरामपुर रेंज को प्रभावी तरीके से संभालने में नाकाम साबित हो रहे हैं और रेंजर का अपना कोई सूचना तंत्र नहीं है और उनके अधीनस्थ कर्मचारी और अधिकारी जंगल के अंदर चल रहे लकड़ी तस्करी के इस खेल की वास्तविकता को छिपाने में कामयाब हैं।

अब इस पूरे मामले में कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं आखिर वे तस्कर कौन थे जिन्होंने निगम की लॉट के छपान वाले पेड़ों को काटकर साफ कर दिया?

वन विभाग के हाथ अब तक उनके गिरेबान तक क्यों नहीं पहुँच पाये? तस्करो का रसूक ऊंचा है या फिर लकड़ी तस्करी की इस बंदरबाट मे वन विभाग के दरोगा गणेश जोशी और फारेस्ट गार्ड की मिली भगत से सारा खेल खेला गया है?

 

 

लगभग एक दर्जन पेड़ों के गायब हो जाने के बाद वन निगम अपना आउटन किस तरह पूरा करेगा? क्या इस पूरे प्रकरण को दबाने के लिए वन निगम और वन विभाग के दस्तावेजों में भी कोई बड़ा खेल खेला जायगा? और सबसे अहम सवाल यह कि मोहनगर मालधनचौड़ बीट के कंपार्टमेंट नंबर 38 में तैनात वन दरोगा गणेश जोशी और फॉरेस्ट गार्ड पर कोई कार्रवाई होगी या फिर हमेशा की तरह यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा?

 

फिलहाल इन सवालों के जवाब मिलना बाकी हैं, लेकिन इतना जरूर साफ है कि जंगलों की यह लूट थमने का नाम नहीं ले रही है और जंगल की बेशकीमती संपदा तस्करों और भ्रष्ट तंत्र के बीच कहीं खोती जा रही है।

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