बंजारी कटिया गेट पर ‘वन माफिया’ और ‘वन निगम’ का अपवित्र गठबंधन: क्या चंद रुपयों के लालच में नतमस्तक हो गया सिस्टम?

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बंजारी कटिया गेट पर ‘वन माफिया’ और ‘वन निगम’ का अपवित्र गठबंधन: क्या चंद रुपयों के लालच में नतमस्तक हो गया सिस्टम?

अज़हर मलिक

नैनीताल। जनपद नैनीताल में खनन सत्र शुरू होते ही कानून व्यवस्था का जो जनाजा बंजारी कटिया गेट पर निकला है, उसने वन निगम के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गहरा कलंक लगा दिया है। एक तरफ धामी सरकार पारदर्शिता का ढोल पीट रही है, तो दूसरी तरफ वन निगम के अधिकारी ‘माफियाओं’ की गोद में बैठकर सरकारी राजस्व को दीमक की तरह चाट रहे हैं। सवाल अब सिर्फ गुंडागर्दी का नहीं, बल्कि उन कुर्सियों पर बैठे ‘सफेदपोश’ जिम्मेदारों का है, जो माफियाओं के रसूख के आगे घुटने टेक चुके हैं।

वैध रजिस्ट्रेशन रद्दी के समान, अवैध गतिविधियों का बोलबाला

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हैरानी की बात यह है कि जिन वाहन स्वामियों ने लाखों का कर्ज लेकर वन निगम में विधिवत रजिस्ट्रेशन कराया और सरकारी खजाने में फीस जमा की, उन्हें डरा-धमकाकर सड़क पर खड़ा कर दिया गया है। वहीं दूसरी ओर, वन निगम के अधिकारियों की नाक के नीचे नदी के सीने को चीरते हुए अवैध वाहन चोरी-छुपे घुस रहे हैं। क्या यह मुमकिन है कि बिना अधिकारियों की ‘हरी झंडी’ के नदी के भीतर परिंदा भी पर मार सके? सूत्रों की मानें तो यह सब ‘मोटा माल’ और ‘कमीशन’ का खेल है, जिसमें वन निगम के छोटे से लेकर बड़े अधिकारी तक आकंठ डूबे नजर आ रहे हैं।

अधिकारियों की चुप्पी या माफिया से साझेदारी?

बंजारी कटिया गेट पर कुछ अराजक तत्वों ने अपनी निजी हुकूमत कायम कर ली है। वैध 10 टायर वाहनों को जबरन रोका जा रहा है, ड्राइवरों के साथ मारपीट हो रही है, लेकिन वन निगम की टीम तमाशबीन बनी हुई है। आखिर वन निगम के इन अधिकारियों का रसूख माफियाओं के सामने क्यों ढीला पड़ जाता है? क्या वन निगम ने अपनी शक्तियां इन गुंडों को ‘लीज’ पर दे दी हैं? या फिर इन स्वयंभू पहरेदारों को अधिकारियों का ही अभयदान प्राप्त है?

राजस्व को चपत, रसूखदारों को ‘छूट’

क्षेत्रवाद और विरोध की आड़ में जो नंगा नाच चल रहा है, वह सीधे तौर पर राज्य के राजस्व को करोड़ों की चोट है। वैध वाहन स्वामी आज मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न झेल रहे हैं, जबकि माफियाओं की गाड़ियां बेखौफ दौड़ रही हैं। जिला प्रशासन और पुलिस की सुस्ती भी इस आग में घी डालने का काम कर रही है।

वन निगम से सीधा सवाल:

क्या सरकारी कुर्सियों पर बैठे अधिकारियों का जमीर मर चुका है? या फिर माफियाओं के नोटों की चमक के आगे उन्हें नियम-कानून दिखाई देना बंद हो गए हैं? अगर वन निगम इन गुंडों पर नकेल नहीं कस पा रहा है, तो क्या यह मान लिया जाए कि नैनीताल जनपद में अब संविधान नहीं, बल्कि माफियाओं का ‘जंगल राज’ चलेगा?

​धामी सरकार के लिए यह परीक्षा की घड़ी है—या तो इन भ्रष्ट अधिकारियों पर गाज गिरेगी, या फिर ‘भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड’ का नारा सिर्फ चुनावी जुमला बनकर रह जाएगा।

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