वन माफिया और सिस्टम का ‘अपवित्र गठबंधन’: बंजारी कटिया गेट पर कानून का जनाजा, क्या स्टोन क्रशर स्वामी के रिमोट पर चल रहा है वन निगम?

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वन माफिया और सिस्टम का ‘अपवित्र गठबंधन’: बंजारी कटिया गेट पर कानून का जनाजा, क्या स्टोन क्रशर स्वामी के रिमोट पर चल रहा है वन निगम?

अज़हर मलिक

नैनीताल जनपद में खनन सत्र का आगाज होते ही बंजारी कटिया गेट भ्रष्टाचार और अराजकता का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। यहाँ वन निगम के अधिकारियों और खनन माफियाओं के बीच जो ‘अनैतिक जुगलबंदी’ देखने को मिल रही है, उसने सरकार के पारदर्शिता के दावों की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। हालत यह है कि खनन क्षेत्र में अब धामी सरकार का इकबाल नहीं, बल्कि रसूखदार माफियाओं की ‘निजी हुकूमत’ चल रही है। विश्वसनीय सूत्रों और धरातल की स्थिति को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि वन निगम के अधिकारियों ने अपनी शक्तियां और जमीर, दोनों चंद सिक्कों के बदले माफियाओं को लीज पर दे दिए हैं।

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इस पूरे काले खेल के केंद्र में वन निगम के डीएलएम ललित आर्य की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। काशीपुर से लेकर जसपुर और अब रामनगर तक, ललित आर्य का कार्यकाल विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा है। चर्चा है कि जब से उन्होंने डीएलएम का कार्यभार संभाला है, तब से नदी का सीना चीरने वाले अवैध ‘सिंडिकेट’ के हौसले बुलंद हो गए हैं। सिस्टम की लाचारी का आलम यह है कि एक रसूखदार स्टोन क्रशर स्वामी के इशारे पर यह तय किया जा रहा है कि नदी में कौन सा वाहन उतरेगा और किसका रास्ता रोका जाएगा। जो वाहन स्वामी लाखों का कर्ज लेकर, सरकारी नियमों का पालन करते हुए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं, उन्हें डरा-धमकाकर बाहर कर दिया गया है, जबकि बिना रॉयल्टी और बिना प्रपत्रों के माफियाओं की गाड़ियां अधिकारियों की नाक के नीचे सरपट दौड़ रही हैं।

विभागीय कार्रवाई के नाम पर जो इक्का-दुक्का ट्रैक्टर-ट्रॉलियां पकड़ी जा रही हैं, वह महज जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए की गई एक ‘बौद्धिक औपचारिकता’ से अधिक कुछ नहीं है। इन पकड़े गए वाहनों के पीछे भी एक सोची-समझी पटकथा होती है—कार्रवाई किस पर होनी है और किसे अभयदान देना है, यह भी वह स्टोन क्रशर स्वामी ही तय करता है जिसके आगे वन निगम और फॉरेस्ट विभाग के आला अधिकारी नतमस्तक नजर आते हैं। क्या यह मुमकिन है कि बिना विभागीय ‘हरी झंडी’ के नदी के प्रतिबंधित क्षेत्रों में माफियाओं का ऐसा नंगा नाच चल सके? यह सब ‘मोटा माल’ और फिक्स ‘कमीशन’ की उस बंदरबांट का नतीजा है, जिसमें छोटे कर्मचारियों से लेकर बड़े साहबान तक आकंठ डूबे हुए हैं।

क्षेत्रवाद और विरोध के नाम पर बंजारी कटिया गेट पर जो अराजकता फैलाई जा रही है, वह सीधे तौर पर राज्य के राजस्व को करोड़ों की चपत है। वैध 10 टायर वाहनों को जबरन रोकना और उनके चालकों के साथ मारपीट करना अब यहाँ की दिनचर्या बन चुकी है, लेकिन पुलिस और प्रशासन की सुस्ती इस आग में घी डालने का काम कर रही है। वन विभाग के अधिकारी गोष्ठियां कर मानव-वन्यजीव संघर्ष पर तो ज्ञान बांट रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी नाक के नीचे हो रहे ‘मानव-सिस्टम संघर्ष’ और अवैध खनन पर उनकी चुप्पी उनके अपराध में शामिल होने की गवाही दे रही है।

आज सवाल सीधा है—क्या  जनपद में संविधान और नियम-कायदे खत्म हो चुके हैं? क्या एक स्टोन क्रशर स्वामी का रसूख इतना बड़ा हो गया है कि पूरा सरकारी अमला उसकी चौखट पर सजदा कर रहा है? यदि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ‘भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड’ के संकल्प को बचाना है, तो इन सफेदपोश जिम्मेदारों और माफियाओं के इस ‘अपवित्र गठबंधन’ को तोड़ना होगा। इस पूरे खेल के पीछे छिपे बड़े चेहरों और स्टोन क्रशर स्वामी के उस रसूखदार साम्राज्य का पर्दाफाश हम अपनी अगली रिपोर्ट में जल्द करेंगे, जिसके कंट्रोल में फिलहाल पूरा रामनगर का सिस्टम दिखाई दे रहा है।

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