RTI की आड़ में ब्लैकमेलिंग का ‘गंदा धंधा’: सूचना के नाम पर आतंक फैलाने वाले ‘फर्जी’ समाजसेवियों पर कब कसेंगे धामी सरकार के हंटर?
अज़हर मलिक
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर सहित विभिन्न जिलों में सूचना का अधिकार (RTI) कानून अब भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार बनने के बजाय कुछ ‘सफेदपोश ब्लैकमेलरों’ के लिए कमाई का जरिया बन चुका है। अपने आप को आरटीआई कार्यकर्ता बताने वाले ये लोग कानून की बारीकियों का फायदा उठाकर विभागों से सूचनाएं तो मांगते हैं, लेकिन उनका मकसद पारदर्शिता लाना नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को दबाने के नाम पर ‘शॉर्टकट’ का खेल खेलना है। उधम सिंह नगर में हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ पहले बड़े ताम-झाम के साथ विभागों से सूचनाएं मांगी जाती हैं, अधिकारियों को घेरने की बिसात बिछाई जाती है, और जैसे ही ‘लेन-देन’ की सेटिंग हो जाती है, वही सूचनाएं अचानक फाइलों के बीच दम तोड़ देती हैं। आखिर क्या कारण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान करने वाले ये ‘झूठे सूरमा’ अपनी लड़ाई को अंजाम तक नहीं पहुँचाते? बीच रास्ते में ही सूचनाओं का लापता हो जाना और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के बजाय चुप्पी साध लेना यह साफ संकेत देता है कि RTI का इस्तेमाल केवल ब्लैकमेलिंग की ढाल के रूप में किया जा रहा है।
यह प्रदेश के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि जो कानून आम नागरिक को सशक्त बनाने के लिए था, उसे कुछ मुट्ठी भर लोगों ने आतंक का पर्याय बना दिया है। क्या धामी सरकार ऐसे फर्जी आरटीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई ठोस रूपरेखा तैयार करेगी? अब समय आ गया है कि सरकार प्रदेश में ऐसे सूचना मांगने वालों का एक विस्तृत ‘डाटा कलेक्शन’ करे, जिससे यह पता चल सके कि किस व्यक्ति ने किस विभाग से कितनी सूचनाएं लीं और उन सूचनाओं का अंत क्या हुआ। आखिर क्यों बड़ी-बड़ी कमियों को उजागर करने वाली सूचनाएं बीच में ही गायब हो जाती हैं? जनता अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से उम्मीद कर रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को इन ‘ब्लैकमेलरों’ पर भी लागू किया जाए। इन फर्जी समाजसेवियों के सिंडिकेट को तोड़ना जरूरी है ताकि असली आरटीआई कार्यकर्ताओं और कानून की गरिमा बची रहे। यदि समय रहते इन पर कानूनी फंदा नहीं कसा गया, तो विकास की राह में रोड़ा अटकाने वाले ये ‘सूचना माफिया’ पूरे तंत्र को खोखला कर देंगे।