नोडल अधिकारी–कोऑर्डिनेटर–शिकयत प्रकोष्ठ की मिलीभगत से चल रहा आयुष्मान का खेल? जवाबदेही पर टालमटोली, मरीजों को हो रही परेशानी!!

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नोडल अधिकारी–कोऑर्डिनेटर–शिकयत प्रकोष्ठ की मिलीभगत से चल रहा आयुष्मान का खेल? जवाबदेही पर टालमटोली, मरीजों को हो रही परेशानी!!

शानू कुमार 

बरेली: उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में आयुष्मान भारत योजना को लेकर बड़ा घोटाला सामने आने की आशंका है। सूत्रों के अनुसार नोडल अधिकारी, कोऑर्डिनेटर और आयुष्मान शिकायत प्रकोष्ठ अधिकारी के बीच गहरी मिलीभगत से ऐसा खेल चल रहा है जिसने गरीबों को मिलने वाली मुफ्त इलाज की सुविधा को पैसे कमाने की मशीन बना दिया है। जब टीम ने योजना से जुड़ी शिकायतों पर नोडल अधिकारी से जानकारी लेनी चाही तो उन्होंने लगातार टालमटोल किया, वहीं शिकायत प्रकोष्ठ अधिकारी ने जिम्मेदारी नोडल अधिकारी पर डाल दी। तीन महीने का शिकायत रिकॉर्ड तक नोडल अधिकारी ठीक से उपलब्ध नहीं करा सके, जिससे संदेह और गहराता जा रहा है।

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बरेली के निजी अस्पतालों में विभागीय अधिकारियों की सांठगांठ से आयुष्मान योजना का बड़ा दुरुपयोग होने की बात सामने आ रही है। सूत्र बताते हैं कि बिना किसी ग्राउंड निरीक्षण किए शिकायतों का निस्तारण किया जा रहा है, और सिर्फ कागजों में खानापूर्ति कर फाइलें क्लोज़ कर दी जा रही हैं। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि जमीनी स्तर की जांच को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।

 

भारत सरकार ने गरीबों को मुफ्त इलाज दिलाने के उद्देश्य से आयुष्मान योजना शुरू की थी, लेकिन बरेली के कई निजी अस्पतालों ने इस योजना को कमाई का माध्यम बना रखा है। पहले जोड़तोड़ से अस्पतालों को योजना में इन- पैनल कराया जाता है और फिर बड़ी सफाई से योजना का दुरुपयोग किया जाता है। जानकारों का दावा है कि कई अस्पताल सरकारी खजाने को चूना लगा रहे हैं और शिकायत करने पर भी अधिकारी सिर्फ गेंद एक-दूसरे के पाले में डालते रहते हैं ताकि किसी की जवाबदेही तय न हो।

 

सूत्र बताते हैं कि अधिकांश निजी अस्पतालों में योजना के नाम पर मरीजों को भर्ती किया जाता है, फिर उनसे जांच, दवाइयों या अन्य मेडिकल प्रक्रियाओं के नाम पर पैसे वसूले जाते हैं। इसके बाद वही केस सरकार से भी क्लेम कर लिया जाता है। यानी पैसा मरीज से भी और सरकार से भी, जबकि योजना का उद्देश्य गरीबों का मुफ्त इलाज था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इन सब पर एक्शन क्यों नहीं ले रहे? क्या विभागीय अधिकारियों और अस्पतालों के बीच कोई गहरी सांठगांठ है?

 

स्थानीय लोगों का आरोप है कि तीन-तीन महीने तक किसी भी अस्पताल का निरीक्षण नहीं किया गया, जिससे अस्पताल मनमानी पर उतरे हुए हैं। नोडल अधिकारी और प्रकोष्ठ की कार्यशैली पर सवाल लगातार बढ़ रहे हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि कई मामलों में फर्जी भर्ती और फर्जी बिलिंग के जरिए करोड़ों रुपये का घोटाला होने की आशंका जताई जा रही है।

 

कुल मिलाकर बरेली में आयुष्मान योजना भ्रष्टाचार के दलदल में फंसती दिख रही है। यदि हाई-लेवल जांच नहीं हुई, तो यह घोटाला आने वाले समय में राज्यस्तरीय घोटाले का रूप ले सकता है। गरीब मरीजों की मदद के लिए बनी योजना अगर इस तरह अधिकारियों–अस्पतालों के गठजोड़ में बर्बाद होती रही, तो यह सरकार के स्वास्थ्य मिशन पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

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