नहीं चाहिए अमेरिकी विकास बचा लीजिये भारतीय सौंधापन : अमित त्यागी

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नहीं चाहिए अमेरिकी विकास बचा लीजिये भारतीय सौंधापन : अमित त्यागी

 

शाहजहांपुर भारतीयता का तात्पर्य कबीर के दोहे में है। साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ ये भाव हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। एक ऐसी विरासत जिसमे भारत की अधिकतर जनसंख्या शहरी चकाचौंध से दूर गावों मे निवास करती है। जहां आपसी प्रेम की डोर खेतों की पगडंडियों से होते हुए दिलों तक पहुँचती है। सादगी फसलों मे लहलहाती है।

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पसीने की बूंदे अमीरी गरीबी के भेद को मिटाकर सबके लिए अन्न उपलब्ध करा देती हैं। जीडीपी मे अपने योगदान से बेखबर ग्रामीण भारतीय महिलाओं का देश की जीडीपी मे महत्वपूर्ण सहयोग रहा है। हमारा ग्रामीण जनजीवन समाज आज कुछ सामाजिक बुराइयों के चंगुल मे फंस गया है। ग्रामीण जनजीवन मे कुछ ऐसी बुराइयाँ घर कर गयी हैं जिनकी वजह से ग्रामीण जनजीवन की सौंधी खुश्बू प्रदूषित हो गयी है। इन बुराइयों का प्रभाव परिवार की महिलाओं पर ज़्यादा होता है। नशा ऐसी ही एक बीमारी है जो समाज को तेजी से निगलते जा रही है। चिंता का विषय नवयुवकों का मादक पदार्थों के चंगुल मे फंसना है।

 

 

 

नशे के आदी व्यक्तियों को समाज मे हीरो की तरह दर्शाता विज्ञापन उद्योग गलत सही का विभेद करने की क्षमताओं को प्रभावित कर रहा है। इस बुराई की ज़िम्मेदारी राजनीतिक तंत्र को लेनी होगी। पाश्चात्य संस्कृति का फूहड़पन, उनका व्यापार मॉडल और उनका रहन सहन हमने विकास के नाम पर अपना लिया। उपभोक्तावादी इस मॉडल में धन को नैतिक आचरण से ऊपर माना जाता है। नैतिकता का हास ज़िम्मेदारी के स्थान पर धन को प्राथमिकता बनाता है।

 

 

 

 

 

उदारीकरण का दौर आने के बाद भारत का बाज़ार जैसे ही विश्व के लिए खुला वैसे ही भोगवादी प्रवृत्ति का पुष्प और ज़्यादा पल्लवित हो गया। किसी भी व्यक्ति की ‘क्रय-शक्ति’ सफलता का मापदंड बन गयी। जब सफलता का मापदंड ‘क्रय-शक्ति’ हो तब ‘नैतिक-आचरण’ जैसी बातं् किताबी और अप्रयोगिक होने लगी। जनता की सोच भी बाज़ार के हिसाब से चलने लगी। जनता की आवाज सरकार की आवाज़ बनने लगी। इस तरह बाज़ार के द्वारा सत्ता और जनता को हाईजैक कर लिया गया।

 

 

 

जो बातें सामाजिक दृष्टि से अस्वीकार थीं वह स्वीकार की जाने लगी। महिला अधिकार और सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं को उपभोग की वस्तु दिखाकर पेश किया जाने लगा। बाज़ार में बिकने वाले हर सामान की मोडेल कम कपड़ों की लड़की होने लगी चाहे उस उत्पाद का उस महिला से कुछ लेना देना हो या न हो। सनी लियोने को एक वैश्विक अन्तराष्ट्रिय व्यापारिक षड्यंत्र के अंतर्गत भारत में प्रचारित एवं प्रसारित किया गया। पॉर्न बाज़ार भारत में एक बड़ा बाज़ार बन कर उभरा। इस तरह से भारत के पूरे सांस्कृतिक परिदृश्य को छिन्न-भिन्न करके योग से भोग की तरफ मोड़कर एक बड़ा बाज़ार पैदा हो गया। 2014 में जीतने वाली मोदी सरकार का मुख्य मुद्दा विकास नहीं था।आशा की किरण जगी थी कि नयी शिक्षा नीति आएगी। सांस्कृतिक हमले रुकेंगे। गौ हत्या प्रतिबंधित होगी। रामराज की तर्ज़ पर शासन दिखेगा। ऐसी अनेक अपेक्षाएँ थीं जिस पर मोदी सरकार खरी नहीं उतरी। मोदी सरकार ने भी बाज़ार के अनुरूप स्वयं को ढाल लिया।

 

 

 

 

हिन्दुत्व के नाम पर बातें बड़ी बड़ी हुईं किन्तु सनातन जीवन शैली पर काम नहीं हुआ। एक बार हिन्दुत्व का मोमेंटम बनने से राज्य दर राज्य भाजपा जीतती भी चली गईं। पूरे देश में भगवा लहरता चला गया किन्तु तंत्र नहीं बदला। अब इसका परिणाम भी देखिये। पेपर लीक, बेरोजगारी, शिक्षा तंत्र की विफलता जैसे विषय भारत को भारतीयता के आधार पर स्थापित न करने के कारण हैं।

 

2014 में जब मोदी सरकार आई तब मुद्दा विकास नहीं था। शायद, केवल हिन्दुत्व भी नहीं था बल्कि बाज़ार के हाथों खेलती भारतीय संस्कृति को बचाना भी था। संघ एवं भारतीय दर्शन से बुद्धिजीवियों में एक बड़ी अपेक्षा पैदा हो गयी थी कि अब शायद ‘यू-टर्न’ बदलाव देखने को मिलेगा किन्तु ऐसा हुआ नहीं। बाज़ार के आगे संघ की शिक्षाएँ धूमिल पड़ गईं। नरेंद्र मोदी बाज़ार के आगे नतमस्तक हो गए। उनका कार्यकाल रामराज की अवधारणा पर नहीं बल्कि कॉर्पोरेट के अनुसार चलता दिखा। 2024 में उत्तर प्रदेश मे विकास के इस गुब्बारे को नकार दिया। भाजपा पूर्ण बहुमत से दूर रह गयी। दिल्ली की एसी में बैठकर गाँव की गर्मी को नहीं समझ सकते हैं। वहाँ के वातावरण को, वहाँ की जरूरतों को, वहाँ की अपेक्षाओं को नहीं समझा जा सकता है।

 

 

 

 

दिल्ली में बैठकर सिर्फ व्यापारिक हित साधे जा सकते हैं। जैसे झारखंड में कोयला खदानें हैं तो छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक संसाधन हैं। राजस्थान में संगमरमर है तो कश्मीर में लिथियम का भंडार है। व्यापार के आधार पर क्षेत्र को समझने से धन ही प्राथमिकता बनेगा। भारतीयता में हर प्राकृतिक संसाधन देवता है। उसका आवश्यकता अनुसार उपयोग स्वीकार्य है।

 

राम मंदिर का बनना सिर्फ एक सांकेतिक पक्ष है। रामराज की स्थापना उसका वृहद स्वरूप है। प्रभु राम को अगर सत्ताधारी आत्मसात कर लेते तो बाज़ार का दुष्प्रभाव भारतीय संस्कृति पर कम होता। दुर्भाग्य से राम नाम को राजनीतिक नाम बना लिया गया। रामराज के स्थान पर, विकास के नाम पर अयोध्या को ढालना वहाँ की सीट भी हरवा गया।

 

 

 

 

काशी का कॉर्पोरेट विकास भी वहाँ की जनता ने स्वीकार नहीं किया है। अयोध्या की आध्यात्मिकता को पूरे देश में फैलाने की आवश्यकता है। अयोध्या को कॉर्पोरेट तीर्थाटन नहीं बनाना है। आज भारत में धार्मिक पर्यटन के नाम पर धार्मिक स्थल मौज मस्ती का केंद्र बन गए हैं। आस्था का भाव नदारद है। सेलफ़ी और फोटो हावी हैं। हमारी केंद्र और राज्य सरकारें राजस्व के आधार पर इसको अपनी सफलता मान रही हैं। अब धार्मिक पर्यटन के नाम पर उत्तराखंड को ढाला जा रहा है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री जैसे दैवीय स्थान आस्था से ज़्यादा सैलानियों के घूमने के स्थान हैं।

 

 

 

हिमाचल प्रदेश में गत वर्ष हमने बाढ़ का तांडव देखा है। अमेरिकी तर्ज़ पर होने वाला यह विकास, वैश्विक उदारीकरण का मॉडल, ऑनलाइन बाज़ार और कॉर्पोरेट सोच वाले तंत्र से हमें भारतीयता की सौंधी खुशबू को बचाना है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।

 

 

 

 

 

 

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