पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर सबका हक़ ऑर्गेनाइजेशन ने उठाई आवाज, बोले – स्वतंत्र प्रेस के बिना लोकतंत्र खोखला
शानू कुमार ब्यूरो उत्तर प्रदेश
बरेली: देश में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों, धमकियों और फर्जी मुकदमों के मामलों को लेकर सबका हक़ ऑर्गेनाइजेशन ने कड़ा रुख अपनाया है। संगठन की अध्यक्षा राफिया शबनम ने पत्रकार सुरक्षा कानून को लोकतंत्र की अनिवार्य जरूरत बताते हुए केंद्र सरकार से इसे जल्द लागू करने की मांग की।
राफिया शबनम ने कहा कि किसी भी लोकतंत्र की मजबूती चुनावी आंकड़ों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निर्भीक प्रेस से आंकी जाती है। प्रेस सत्ता का आईना होती है, लेकिन जब सच दिखाने वाले पत्रकार ही असुरक्षित हो जाएं, तो लोकतंत्र केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है। ऐसे हालात में पत्रकार सुरक्षा कानून कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भारत में पत्रकारों पर हमले, धमकियां, झूठे मुकदमे, गिरफ्तारियां और सामाजिक बहिष्कार अब असामान्य नहीं रहे। जमीन, खनन, भ्रष्टाचार, जातीय हिंसा, महिला उत्पीड़न, सरकारी अनियमितताओं और कॉरपोरेट गठजोड़ जैसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सबसे ज्यादा निशाने पर रहते हैं। कई मामलों में हमलावर खुलेआम घूमते हैं, जबकि पीड़ित पत्रकार न्याय के लिए भटकता रहता है।
संगठन का कहना है कि पत्रकार सुरक्षा कानून का मूल उद्देश्य यह होना चाहिए कि पत्रकार बिना डर अपना काम कर सकें। यह कानून उन्हें शारीरिक हमलों, मानसिक उत्पीड़न, धमकियों और फर्जी मामलों से सुरक्षा दे, ताकि वे सत्ता से सवाल पूछने का साहस कर सकें। स्वतंत्र प्रेस ही सत्ता को जवाबदेह बनाती है, घोटालों को उजागर करती है और हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज़ मुख्यधारा तक पहुंचाती है।
राफिया शबनम ने कहा कि यह केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं, बल्कि जनता के जानने के अधिकार से जुड़ा सवाल है। यदि पत्रकार असुरक्षित रहेंगे, तो सच स्वतः चुप हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि जिन देशों में लोकतंत्र मजबूत है, वहां पत्रकारों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचे मौजूद हैं, जबकि भारत में अब तक राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई प्रभावी कानून नहीं है। कुछ राज्यों की पहल नाकाफी साबित हुई है।
सबका हक़ ऑर्गेनाइजेशन ने मांग की कि प्रस्तावित पत्रकार सुरक्षा कानून में पत्रकारों पर हमले को गंभीर अपराध माना जाए, त्वरित जांच और न्याय की गारंटी हो, सरकारी और गैर-सरकारी दोनों तरह के दबाव से सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और यह साफ संदेश जाए कि सच बोलना अपराध नहीं है।
संगठन ने कहा कि यह कानून सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में होगा। जो सरकार पारदर्शी और जवाबदेह है, उसे स्वतंत्र पत्रकारिता से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। सोशल मीडिया के दौर में जब तथ्य और अफवाह के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है, तब पेशेवर पत्रकारिता की भूमिका और भी अहम हो जाती है, लेकिन बिना सुरक्षा के पत्रकारिता संभव नहीं।
अंत में संगठन ने सवाल उठाया कि अब यह बहस टालने का समय नहीं है कि पत्रकार सुरक्षा कानून चाहिए या नहीं, बल्कि यह तय करने का समय है कि क्या देश लोकतंत्र को जीवित रखना चाहता है या उसे केवल औपचारिक बनाकर छोड़ देना चाहता है।