बेटी के शव पर इंसाफ की बाट जोहती माँ और सिस्टम की संवेदनहीनता: उत्तर प्रदेश में नारी सुरक्षा के दावों की खुली पोल
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से आई यह खबर न केवल दिल को दहला देने वाली है, बल्कि योगी सरकार के उन दावों पर भी एक बड़ा तमाचा है, जिनमें ‘पिंक बूथ’ और ‘मिशन शक्ति’ के नाम पर महिलाओं की सुरक्षा का दम भरा जाता है। गोमतीनगर जैसे पॉश इलाके में पढ़ाई करने आई अयोध्या की एक मासूम बेटी, वैष्णवी सोनी, जब एक मनचले पंकज यादव की प्रताड़ना से हारकर मौत को गले लगा लेती है,
।तो यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं बल्कि प्रदेश की चरमराई कानून व्यवस्था द्वारा की गई हत्या है। अगस्त 2025 में जब उस मासूम ने आखिरी सांस ली होगी, तब उसने सोचा होगा कि शायद उसकी मौत के बाद उसके परिवार को न्याय मिलेगा, लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस की सुस्ती का आलम यह है कि उसे एक अदद एफआईआर दर्ज कराने के लिए अपनी ममता को चार महीने तक दर-दर भटकते देखना पड़ा। 3 जनवरी 2026 को जब केस दर्ज हुआ, तब तक सिस्टम की फाइलें सफेद से काली हो चुकी थीं, लेकिन एक बेबस माँ के आंसू नहीं सूखे ‘एंटी रोमियो स्क्वाड’ का शोर मचाने वाली पुलिस आज एक आरोपी को गिरफ्तार करने में नाकाम है, जो खुलेआम घूमकर खाकी की इकबाल को चुनौती दे रहा है। हाथरस से लेकर उन्नाव तक और अब राजधानी की सड़कों पर तड़पती ये माँएं पूछ रही हैं कि आखिर कब तक बेटियों की लाशों पर राजनीति की रोटियां सेंकी जाएंगी?
क्या सरकार के बड़े-बड़े होर्डिंग्स सिर्फ प्रचार के लिए हैं, क्योंकि जमीन पर तो आज भी बेटियां असुरक्षित हैं और अपराधी बेखौफ। यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं के लिए इंसाफ का रास्ता थाने की चौखट पर आकर दम तोड़ देता है, जहाँ वर्दीधारी रक्षक नहीं, बल्कि मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते हैं