उंगलियों से छूकर मिटाया उपेक्षा का दंश: रायबरेली के आश्रम में जब ‘अपनों’ ने थामा ‘अनजान’ जख्मों का हाथ

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उंगलियों से छूकर मिटाया उपेक्षा का दंश: रायबरेली के आश्रम में जब ‘अपनों’ ने थामा ‘अनजान’ जख्मों का हाथ

नरेंद्र त्रिपाठी

समाज में जहाँ लोग अक्सर परछाइयों से भी किनारा कर लेते हैं, वहाँ कुछ हाथ ऐसे भी हैं जो सीधे उन जख्मों को छूने का साहस रखते हैं जिन्हें दुनिया ने भुला दिया है। रायबरेली के जय दुर्गा कुष्ठ सेवा आश्रम में सन्नाटा तो रोज रहता है, लेकिन इस बार वह सन्नाटा किसी डर का नहीं बल्कि एक गहरी उम्मीद का था। समर्पण फाउंडेशन दिल्ली और सेवा भारती के साझा संकल्प ने यहाँ एक ऐसी इबारत लिखी, जिसने साबित कर दिया कि असली सेवा केवल कागजों पर नहीं, बल्कि उन उंगलियों के बीच होती है जो मरहम लगाने से नहीं हिचकिचातीं।

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कहानी किसी चमत्कार की नहीं बल्कि उस निष्काम कर्म की है, जहाँ दिल्ली से आए डॉक्टर देव उत्कर्ष ने आधुनिक एनेलाइजर मशीनों के जरिए रक्त परीक्षण, सीबीसी और शुगर की बारीकियों को टटोला, ताकि उन शरीरों को फिर से मुख्यधारा का अहसास कराया जा सके जिन्हें समाज ने हाशिए पर धकेल दिया था। शिविर का आगाज सेवा भारती के विभाग अध्यक्ष सुनील गुप्ता, डॉक्टर सौम्या वर्मा और डॉक्टर शिवा कान्त त्रिपाठी की मौजूदगी में हुआ, लेकिन इसकी असली रूह उन क्षणों में दिखी जब संतोष रानी और अंजलि शुक्ला जैसे सहयोगियों ने बेहद आत्मीयता के साथ रोगियों की पट्टियां बदलीं। यह केवल चिकित्सा नहीं थी, बल्कि यह उन दूरियों को पाटने की कोशिश थी जो कुष्ठ रोग के साथ जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं ने पैदा कर दी थीं।

सेवा भारती की जिला अध्यक्ष नीरज गुप्ता और उपाध्यक्ष साधना शर्मा की देखरेख में चले इस अभियान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग सेवा प्रमुख गया प्रसाद ने जब मरीजों को आवश्यक उपकरण सौंपे, तो वह केवल सहायता का वितरण नहीं था, बल्कि एक भरोसा था कि वे अकेले नहीं हैं। समर्पण और सेवा के इस संगम ने रायबरेली की धरती पर यह संदेश साफ कर दिया कि जब सेवा का भाव ‘स्व’ से ऊपर उठकर ‘सर्व’ तक पहुँचता है, तभी समाज की वास्तविक शल्क चिकित्सा संभव है।

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