कोसी नदी में खनन: ‘यू-टर्न’ वाली कार्यशैली पर सवाल, क्या रसूखदारों के आगे झुक गई अधिकारियों की कलम?
अज़हर मलिक
रामनगर : कोसी नदी में खनन सत्र शुरू होते ही प्रशासनिक आदेशों और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई है। जो प्रशासन कल तक 10-टायर डंपरों को अवैध खनन और सड़क हादसों का मुख्य कारण बताकर प्रतिबंधित कर रहा था, आखिर ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी कि अब उन्हीं ‘दैत्य’ रूपी वाहनों के लिए लाल कालीन बिछाया जा रहा है? अधिकारियों के बदलते बयानों ने अब स्थानीय ट्रांसपोर्टरों के गुस्से को भड़का दिया है।
कल जो ‘अवैध’ था, आज वो ‘सहमति’ कैसे बना?
हैरानी की बात यह है कि कुछ ही दिन पहले वन निगम और प्रशासनिक अधिकारियों ने बड़े ढोल-नगाड़ों के साथ घोषणा की थी कि कोसी नदी में केवल 6-टायर वाहनों का पंजीकरण होगा ताकि युवाओं को रोजगार मिले और माफियाओं पर लगाम लग सके। स्टोन क्रेशर स्वामियों के बीच हुई एक बंद कमरे की बैठक के बाद अचानक ’20 प्रतिशत 10-टायर डंपर’ चलाने की बात सामने आ रही है।
बड़ा सवाल यह है: क्या 10-टायर वाहनों से होने वाले सड़क हादसे अब रुक जाएंगे?
क्या अधिकारियों की वह दलील दफन हो गई जिसमें उन्होंने कहा था कि बड़े वाहन अवैध खनन को बढ़ावा देते हैं? या फिर स्टोन क्रेशर मालिकों के रसूख के आगे प्रशासन की ‘ईमानदारी’ ने घुटने टेक दिए हैं?
पूंजीपतियों का फायदा और छोटे ट्रांसपोर्टरों की कमर
कालूसिद्ध गेट और खड़ंजा गेट से जुड़े ट्रांसपोर्टरों ने आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन का स्पष्ट आरोप है कि प्रशासन कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने के लिए छोटे ट्रैक्टर और 6-टायर वाहन स्वामियों के हक पर डाका डाल रहा है। कालूसिद्ध गेट खनन समिति के अध्यक्ष अनवर मलिक ने साफ कहा कि यह बदलाव केवल बड़े सिंडिकेट को फायदा पहुँचाने की साजिश है।
अधिकारियों का ‘दोहरा मापदंड’
एक तरफ प्रशासन सीसीटीवी कैमरे लगाने और सख्त चेकिंग की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ उन बड़े वाहनों को एंट्री देने की राह आसान कर रहा है जो नियमों की धज्जियाँ उड़ाने के लिए कुख्यात हैं। अधिकारियों का यह कहना कि ‘सहमति बनी है’, खुद अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास है। क्या प्रशासन की नीतियां जनहित के बजाय ‘सहमति’ और ‘सेटिंग’ पर आधारित हैं?
निष्कर्ष: कोसी की कोख को बचाने का दावा करने वाला प्रशासन अब खुद कठघरे में है। अधिकारियों को जवाब देना होगा कि आखिर उनकी कलम से निकले आदेशों की मर्यादा क्या है? क्या नियम सिर्फ गरीबों के लिए हैं, या फिर रसूखदारों के दबाव में नियम हर हफ्ते बदलते रहेंगे?