THE GREAT NEWS EXCLUSIVE: उत्तराखंड पुलिस के खर्चों में 419% का ‘महा-विस्फोट’, RTI खुलासे ने उड़ाई सिस्टम की नींद
अज़हर मलिक
उत्तराखंड की शांत वादियों के बीच खाकी वर्दी के वित्तीय साम्राज्य में एक ऐसा ‘भूकंप’ आया है जिसकी गूँज शासन के गलियारों तक सुनाई दे रही है। यह महज सरकारी बजट के आंकड़े नहीं बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई के उस बेतहाशा विस्तार की कहानी है जिसने पारदिर्शता के दावों को धुआं-धुआं कर दिया है।
सूचना अधिकार कार्यकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता नदीम उद्दीन द्वारा पुलिस मुख्यालय से निकलवाई गई जानकारी ने इस सच से पर्दा उठाया है कि पिछले पांच सालों में उत्तराखंड पुलिस के खर्चों में किसी सामान्य बढ़ोत्तरी के बजाय 419 प्रतिशत की एक ऐसी ‘अति-असामान्य’ उछाल आई है जो वित्तीय विशेषज्ञों को भी हैरान कर रही है। वर्ष 2020-21 में जो पुलिसिया तंत्र मात्र 40.37 करोड़ रुपये के बजट में अपनी व्यवस्थाएं संचालित कर रहा था, वह वर्ष 2024-25 तक आते-आते अचानक 209.63 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बोझ में तब्दील हो गया है। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल उन ‘अदृश्य’ मदों पर खड़ा हो रहा है जहाँ बजट का बढ़ा हुआ हिस्सा किसी अंधेरे कुएँ की तरह समा गया है।
हैरानी की बात यह है कि जहाँ विभाग के रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले जमीनी पुलिसकर्मियों के वेतन, भत्ते और चिकित्सा प्रतिपूर्ति जैसे संवेदनशील मदों में या तो मामूली वृद्धि हुई है या फिर भारी कटौती कर दी गई है, वहीं दूसरी तरफ ‘गुप्त सेवा’ और ‘पारिश्रमिक’ जैसे मदों में खर्च का ग्राफ किसी रॉकेट की तरह ऊपर भाग रहा है। आरटीआई के आधिकारिक दस्तावेज चीख-चीख कर बता रहे हैं कि पांच वर्षों के भीतर गुप्त सेवा व्यय में 16 गुना की वृद्धि हुई है, जबकि पारिश्रमिक मद में तो 2422 प्रतिशत की ऐसी ऐतिहासिक छलांग लगी है जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। आखिर कौन सी ऐसी ‘विशेष और गुप्त सेवाएं’ ली जा रही हैं जिन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए? इस डिजिटल दौर में विज्ञापन और प्रकाशन पर 2643 प्रतिशत और कंप्यूटर हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर पर 3165 प्रतिशत का अतिरिक्त खर्च ‘स्मार्ट पुलिसिंग’ के नाम पर संसाधनों की बंदरबांट की ओर इशारा करता है।
इतना ही नहीं, पुलिस की गतिशीलता बढ़ाने के नाम पर जो ‘फ्यूल’ फूंका गया और जो ‘लग्जरी वाहन’ खरीदे गए, उनके आंकड़े किसी भी टैक्सपेयर का सिर चकरा देने के लिए काफी हैं। वाहनों की खरीद में 7130 प्रतिशत और उनके संचालन व ईंधन पर 6121 प्रतिशत की बेतहाशा बढ़ोत्तरी दर्शाती है कि पुलिस अब सड़कों से ज्यादा ‘बजट की फाइलों’ में दौड़ रही है। थानों में लगे सीसीटीवी कैमरों के नाम पर भी 17 गुना अधिक राशि खर्च की गई, लेकिन विडंबना देखिए कि जिस पुलिसकर्मी को बीमार होने पर इलाज के पैसे मिलने चाहिए थे, वहां चिकित्सा प्रतिपूर्ति मद में 63 प्रतिशत की निर्मम कटौती कर दी गई। यह रिपोर्ट साफ करती है कि देवभूमि की पुलिसिंग अब मूलभूत जरूरतों से भटककर हाई-टेक चकाचौंध, गुप्त ऑपरेशनों और भारी-भरकम विज्ञापनों के मकड़जाल में उलझ गई है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इस ‘वित्तीय सुनामी’ का ऑडिट कराती है या इसे भी सिस्टम की फाइलों में हमेशा के लिए दफन कर दिया जाता है।