ब्याज या व्यापार? जानिए इस्लाम में निवेश के वो तरीके जो ‘सूद’ से पाक और पूरी तरह ‘हलाल’ हैं

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ब्याज या व्यापार? जानिए इस्लाम में निवेश के वो तरीके जो ‘सूद’ से पाक और पूरी तरह ‘हलाल’ हैं

विशेष डेस्क (The Great News): आज के आधुनिक युग में बैंकिंग और फाइनेंस का पूरा ढांचा ब्याज (Interest) पर टिका हुआ है। लेकिन इस्लाम में ‘सूद’ यानी ब्याज को न केवल वर्जित (हराम) माना गया है, बल्कि इसे समाज के शोषण का एक जरिया बताया गया है। ऐसे में कई मुस्लिम भाई इस उलझन में रहते हैं कि वे अपनी जमा पूंजी को कैसे बढ़ाएं या किसी की आर्थिक मदद कैसे करें जो पूरी तरह ‘जायज’ हो।

आज हम आपको उन तरीकों के बारे में बताएंगे, जिनके जरिए आप ब्याज के बिना भी व्यापारिक लाभ कमा सकते हैं।

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1. मुनाफे की साझेदारी (Profit Sharing): पैसे पर नहीं, व्यापार पर फोकस

ब्याज और हलाल मुनाफे में सबसे बड़ा फर्क ‘जोखिम’ (Risk) का है। ब्याज में पैसा देने वाला सुरक्षित रहता है और लेने वाला डूब जाता है। लेकिन ‘मुदारबाह’ और ‘मुशारकाह’ जैसे तरीकों में पैसा लगाने वाला और मेहनत करने वाला दोनों मुनाफे और नुकसान में बराबर के साझीदार होते हैं।

नियम: इसमें आप यह तय नहीं करते कि मुझे हर महीने 10,000 रुपये चाहिए, बल्कि आप यह तय करते हैं कि होने वाले मुनाफे का 30% या 50% मेरा होगा।

2. मुराबहा (Murabaha): वस्तु का व्यापार, न कि पैसों का

अगर किसी व्यक्ति को व्यापार के लिए सामान चाहिए, तो उसे नकद पैसा उधार देने के बजाय आप उसे वह सामान खरीदकर दे सकते हैं।

उदाहरण: मान लीजिए किसी को 1 लाख की मशीन चाहिए। आपने वह मशीन खरीदी और उसे 1 लाख 10 हजार रुपये में किस्तों (EMI) पर उस व्यक्ति को बेच दिया। यहाँ जो 10 हजार आप कमा रहे हैं, वह ब्याज नहीं बल्कि व्यापारिक ‘प्रॉफिट मार्जिन’ है, क्योंकि आपने वस्तु की खरीद-फरोख्त की है।

3. इजारा (Ijarah): किराए के जरिए कमाई

यह संपत्ति को लीज या किराए पर देने जैसा है। आप कोई प्रॉपर्टी, वाहन या मशीनरी खरीदकर उसे किसी को इस्तेमाल के लिए दे सकते हैं। इससे होने वाली मासिक आय पूरी तरह जायज है, क्योंकि आप अपनी संपत्ति के इस्तेमाल का किराया ले रहे हैं, न कि मूल धन पर ब्याज।

4. कर्ज़-ए-हसना: रूहानी और सामाजिक भलाई

इस्लाम में बिना किसी लालच के किसी की मदद करना ‘कर्ज़-ए-हसना’ कहलाता है। इसमें आप जितनी रकम देते हैं, उतनी ही वापस लेते हैं। हालांकि इसमें दुनियावी मुनाफा नहीं है, लेकिन इसे मजहबी तौर पर बहुत ऊंचे दर्जे का काम माना गया है।

ब्याज और हलाल निवेश में मुख्य अंतर

ब्याज (Interest) हलाल निवेश (Halal Investment)

पैसा देने वाला कोई जोखिम नहीं उठाता। मुनाफे के साथ नुकसान का भी जोखिम होता है।

कर्जदार की स्थिति चाहे जो हो, उसे ब्याज देना पड़ता है। अगर व्यापार में घाटा हुआ, तो निवेशक भी उसे साझा करता है।

यह समाज में आर्थिक असमानता बढ़ाता है। यह समाज में व्यापार और रोजगार को बढ़ावा देता है।

 

 

निष्कर्ष:

इस्लाम व्यापार की इजाजत देता है, लेकिन शोषण की नहीं। यदि आप ब्याज से बचकर पैसा कमाना चाहते हैं, तो ‘साझेदारी’ और ‘वस्तु व्यापार’ सबसे बेहतरीन विकल्प हैं। किसी भी बड़े निवेश से पहले स्थानीय उलेमा या इस्लामिक फाइनेंस के विशेषज्ञों से सलाह जरूर लें।

रिपोर्ट- टीम ‘The Great News’

 

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