मुख्य स्क्रिप्ट (लगभग 1000+ शब्द, एक पैराग्राफ में):

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उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित कौसानी को आमतौर पर एक खूबसूरत हिल स्टेशन और हरे-भरे चाय बागानों के लिए जाना जाता है, लेकिन इन चाय बागानों के पीछे जो सच्चाई छिपी है, वह बेहद पीड़ादायक और चौंकाने वाली है। कौसानी के चाय बागानों में काम करने वाले सैकड़ों मजदूर आज भी न्यूनतम मजदूरी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, अस्थायी रोजगार और सरकारी उपेक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन बागानों में दशकों से काम कर रहे पुरुषों और महिलाओं को न तो स्थायी कर्मचारी का दर्जा मिला है और न ही सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का पूरा लाभ। कई मजदूरों को रोज़ाना महज़ 200 से 250 रुपये की दिहाड़ी पर काम करना पड़ता है, वो भी बिना किसी मेडिकल सुविधा या पेंशन योजना के। महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय है, क्योंकि उन्हें न सिर्फ खेतों में दिनभर काम करना पड़ता है, बल्कि घर लौटकर भी घरेलू ज़िम्मेदारियों को निभाना होता है। इन बागानों में पीने के साफ पानी की सुविधा नहीं है, बच्चे शिक्षा से वंचित हैं और यदि कोई बीमार पड़ जाए तो उसे नज़दीकी शहर तक इलाज के लिए ले जाना पड़ता है, क्योंकि गांवों में कोई स्थायी स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। स्थिति तब और भी चिंताजनक हो जाती है जब बारिश या बर्फबारी के चलते हफ्तों तक काम ठप हो जाता है, जिससे मजदूरों को भूखे सोने की नौबत तक आ जाती है। कई बार सरकारों ने वादे कि

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