वन विभाग की नाक के नीचे बाघ की बेरहमी से हत्या और अंग-भंग की वारदात ने खोली मुस्तैदी की पोल, वन्यजीवों की सुरक्षा राम भरोसे।
अज़हर मलिक
उत्तराखंड के जंगलों में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले वन विभाग के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए हरिद्वार की श्यामपुर रेंज से एक ऐसी रूह कंपा देने वाली और शर्मनाक घटना सामने आई है, जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सजनपुर बीट के कम्पार्टमेंट संख्या 09 में मात्र दो वर्ष के एक मासूम नर बाघ का क्षत-विक्षत शव मिलना वन विभाग की घोर लापरवाही और गश्त व्यवस्था के खोखलेपन का जीता-जागता सबूत है। सबसे ज्यादा विचलित करने वाली बात यह है कि शिकारियों ने न सिर्फ बाघ को जहर देकर तड़पा-तड़पा कर मार डाला, बल्कि उसके चारों पैर भी काट दिए।
यह क्रूरता इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राष्ट्रीय पशु होने के बावजूद बाघों को जंगलों में कड़ा पहरा देने के दावों के बीच खुला छोड़ दिया गया है। शिकार की यह खौफनाक साजिश वन विभाग की नाक के नीचे रची गई, जहाँ स्थानीय वन गुर्जरों ने एक मृत भैंस पर जहर छिड़क कर बाघ को मौत के घाट उतार दिया और विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। अगर समय रहते खुफिया तंत्र सक्रिय होता तो शायद देश के इस गौरव को तस्करों की हैवानियत से बचाया जा सकता था, लेकिन हमेशा की तरह विभाग तब जागा जब बाघ की जान जा चुकी थी।
इस सनसनीखेज वारदात ने इसलिए भी वन विभाग की नींद उड़ा दी है क्योंकि अभी तक वन्यजीवों के शिकार में बाहरी तस्करों के नाम आते थे, लेकिन अब विभाग की छत्रछाया में जंगलों के भीतर रहने वाले स्थानीय लोग ही भक्षक बन चुके हैं, जो अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है। हालाँकि विभाग अब आलम उर्फ फम्मी नामक एक आरोपी को गिरफ्तार कर और एनटीसीए (NTCA) प्रोटोकॉल के तहत पोस्टमार्टम का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सच तो यह है कि आमिर हमजा जैसा मुख्य आरोपी अभी भी उनकी गिरफ्त से बाहर भागने में सफल रहा। डीएफओ हरिद्वार स्वप्निल अनिरुद्ध भले ही अब कठोर कानूनी कार्रवाई और श्यामपुर रेंज में निगरानी बढ़ाने की बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हों, परंतु जमीनी हकीकत यह है
कि जब तक शिकारियों के हौसले इतने बुलंद रहेंगे कि वे सरेआम बाघों के अंग काटने की जुर्रत कर सकें, तब तक वन विभाग की चौकसी महज़ कागज़ी दावों से ज्यादा कुछ नहीं मानी जाएगी। यह घटना देवभूमि के जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था पर एक अमिट कलंक है, जिसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारे बेशकीमती वन्यजीव किसके भरोसे सुरक्षित हैं।


