ममता की छांव और तराई पश्चिमी के बेजुबानों का सुरक्षा कवच: डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य के अनूठे प्रयासों से महक रहा है जंगल का आंचल
अज़हर मलिक
माँ सिर्फ इंसानों में ही नहीं, बल्कि जंगल की हर धड़कन में बसती है, जहाँ कभी एक बंदरिया अपने बच्चे को सीने से लगाकर पेड़ों पर छलांग लगाती है, तो कभी एक हिरणी खतरे के बीच भी अपने शावक को छुपाकर खुद ढाल बनकर खड़ी हो जाती है, यहाँ तक कि पक्षियों की माँ अपने नन्हों के लिए बार-बार घोंसले तक दाना लाती है और हाथिनी पूरे झुंड के साथ अपने बच्चे की रक्षा के लिए किसी भी चुनौती से टकरा जाती है।
जंगल का यही निस्वार्थ ममतामयी एहसास हमें सिखाता है कि “माँ” एक ऐसा गहरा प्रेम है जो बिना शब्दों के भी सब कुछ कह जाता है, और इसी ममता और जंगली जीवों की सुरक्षा को नया आयाम दे रहे हैं तराई पश्चिमी डिवीजन के मुखिया डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य, जिनके नेतृत्व में वन्यजीवों की हिफाजत के लिए अनेकों सराहनीय और प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। इस मदर्स डे के विशेष अवसर पर उन सभी माँओं को नमन करते हुए, जो अपने बच्चों के लिए हर संघर्ष और मुश्किल से लड़ जाती हैं—चाहे वह इंसान हों या जंगल की ये खामोश रानियाँ—डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य ने स्पष्ट रूप से कहा है कि तराई पश्चिमी का वन विभाग न केवल जंगलों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है,

बल्कि यहाँ रहने वाले हर छोटे-बड़े जीव को एक सुरक्षित और भयमुक्त प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकता है क्योंकि जब जंगल सुरक्षित रहेगा तभी प्रकृति की ये ममतामयी धड़कनें बरकरार रहेंगी। उनके मार्गदर्शन में विभाग द्वारा चलाए जा रहे सुरक्षा अभियानों और वनों की सघन निगरानी ने यह साबित कर दिया है कि एक सजग नेतृत्व किस प्रकार बेजुबानों की रक्षा के लिए ढाल बन सकता है, जिससे न केवल जानवरों का कुनबा फल-फूल रहा है बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र भी मजबूत हो रहा है।




