उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दावों की जमीनी हकीकत: समयबद्ध न्याय की उम्मीदों और प्रशासनिक कछुआ चाल के बीच पिसता आम उपभोक्ता
अज़हर मलिक
नए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में आम नागरिकों को त्वरित और प्रभावी न्याय दिलाने के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, धरातल पर स्थितियां इसके ठीक विपरीत नजर आ रही हैं। उपभोक्ता अदालतों में मामलों का समय पर निस्तारण न होना एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है, जिससे त्वरित न्याय की अवधारणा महज एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह गई है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ऊधमसिंह नगर जिला उपभोक्ता आयोग के केस निपटारे से संबंधित हालिया आधिकारिक आंकड़ों से मिलता है, जो व्यवस्था की धीमी कार्यप्रणाली और उपभोक्ताओं की निराशाजनक स्थिति को उजागर करते हैं।
आधिकारिक अभिलेखों के गहन विश्लेषण से यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि वर्ष 2026 में मई माह तक निपटाए गए कुल 67 मामलों में से मात्र 20 केसों में ही उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत मिल सकी है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि कानूनी चौखट पर पहुंचने वाले एक बड़े हिस्से को न्याय की आस में खाली हाथ लौटना पड़ा है। विडंबना यह है कि कानूनन जिन मामलों का निपटारा 90 से 150 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से हो जाना चाहिए था, वे वर्षों से फाइलों में दबे हुए हैं। वर्तमान में स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि 8 मामले पिछले 5 वर्षों से भी अधिक समय से लंबित पड़े हैं, जो न्याय प्रक्रिया की सुस्ती का जीवंत उदाहरण हैं।
इस पूरी प्रशासनिक शिथिलता का खुलासा सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई एक जानकारी में हुआ है। काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन द्वारा जिला उपभोक्ता आयोग से मामलों के निस्तारण, मध्यस्थता सेल के गठन और वादों की प्रगति आख्या के संबंध में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी गई थीं। इसके प्रत्युत्तर में लोक सूचना अधिकारी व वरिष्ठ सदस्य नवीन चन्द्र चन्दौला ने पत्रांक 129 के माध्यम से प्रमाणित विवरण और दस्तावेजों की सत्यापित फोटो प्रतियां उपलब्ध कराई हैं, जो व्यवस्था के भीतर व्याप्त खामियों को पुख्ता तौर पर प्रमाणित करती हैं।
मई 2026 के अंत तक उपलब्ध कराई गई प्रगति आख्या के अनुसार, जिला आयोग में कुल 301 मामले लंबित चल रहे थे। इस विशाल संख्या में से केवल 22 केस ही ऐसे हैं जो 90 दिनों से कम अवधि के हैं, यानी जिन्हें नियमानुसार नया माना जा सकता है। इसके विपरीत, लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे मामलों की संख्या डराने वाली है; जिसमें 124 मामले दो वर्ष से अधिक पुराने हैं, 78 मामले एक वर्ष से अधिक और 38 मामले छह माह से अधिक की समय सीमा पार कर चुके हैं। ये आंकड़े वैधानिक समय-सारणी के खुले उल्लंघन को प्रदर्शित करते हैं।
उपभोक्ता मामलों के जानकारों और कानूनी प्रावधानों के अनुसार, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धाराओं के तहत किसी भी सामान्य मामले का निपटारा साधारणतः 90 दिनों के भीतर और प्रयोगशाला परीक्षण की आवश्यकता वाले मामलों में अधिकतम 150 दिनों के भीतर करना अनिवार्य है। इसके अलावा, अधिनियम की धारा 38(7) स्पष्ट रूप से यह निर्देशित करती है कि सुनवाई के दौरान तारीख (तिथि स्थगन) देने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाए। अपवादित और अपरिहार्य परिस्थितियों में ही कारण दर्ज करते हुए तथा विपक्षी पर हर्जाना लगाते हुए अगली तारीख देने का प्रावधान है। परंतु व्यावहारिक धरातल पर इन कड़े नियमों का समुचित अनुपालन न होने के कारण तारीख-पर-तारीख का अंतहीन सिलसिला जारी है, जिससे पीड़ित उपभोक्ता खुद को ठगा सा महसूस करता है।
जनवरी 2026 से मार्च 2026 की तिमाही रिपोर्ट के आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करने पर यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि विलंब का मुख्य कारण प्रक्रियाओं की जटिलता और पक्षकारों द्वारा बार-बार लिया जाने वाला तिथि स्थगन है। लंबित वादों में शामिल 5 वर्ष से अधिक पुराने 8 मामलों में से एक केस साल 2020 से और 7 केस साल 2021 से लगातार खिंच रहे हैं। न्यायालयीन प्रक्रिया में इस तरह का लंबा ठहराव उपभोक्ता अदालतों के गठन के मूल उद्देश्यों पर ही सवालिया निशान खड़ा करता है।
यदि वर्ष 2001 में इस जिला आयोग अथवा फोरम की स्थापना से लेकर 31 मार्च 2026 तक के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो अब तक कुल 4,089 उपभोक्ता वाद दायर किए जा चुके हैं। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट और सेवा प्रदाताओं की मनमानी का है, जहां सर्वाधिक 1,360 परिवाद अकेले बीमा (इंश्योरेंस) क्षेत्र से संबंधित हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर बैंकिंग सेवाओं के खिलाफ 238 मामले और तीसरे स्थान पर बिजली विभाग की अनियमितताओं से जुड़े 212 मामले दर्ज हैं। इन प्रमुख क्षेत्रों के अलावा चिकित्सा लापरवाही के 172, दूरसंचार सेवाओं के 160, गृह निर्माण व हाउसिंग के 152, एयरलाइंस के 5 तथा अन्य विविध सेवाओं से संबंधित 1,763 विवाद आयोग के समक्ष पहुंचे हैं।
केस डिस्पोजल रजिस्टर के पन्नों को पलटने से एक और कड़वी सच्चाई उजागर होती है कि उपभोक्ताओं को न केवल देर से न्याय मिल रहा है, बल्कि उस देरी के बाद भी उनके हक में फैसले आने की दर बेहद कम है। जनवरी से मई 2026 के मध्य जिन 67 मामलों को बंद किया गया, उनमें से महज 20 ही उपभोक्ताओं के पक्ष में रहे। मासिक विश्लेषण के अनुसार, जनवरी में निपटाए गए 10 मामलों में से सिर्फ 3 में परिवादी को राहत मिली, जबकि 5 को खारिज कर दिया गया और 2 वापस ले लिए गए। फरवरी के 16 मामलों में से केवल 3 उपभोक्ताओं के हक में गए, जबकि 4 निरस्त हुए, 1 वापस हुआ और 8 मामले ‘नोट प्रेस’ श्रेणी में चले गए। मार्च के 11 केसों में से 5 उपभोक्ता के पक्ष में रहे, जबकि शेष विपक्षी के पक्ष में या तकनीकी कारणों से बंद हुए। अप्रैल के 14 मामलों में मात्र 4 और मई के 16 मामलों में से भी केवल 5 मामलों में ही उपभोक्ताओं की जीत हो सकी।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिला आयोग द्वारा राज्य आयोग को भेजी जाने वाली मासिक व त्रैमासिक रिपोर्टों में जिन मामलों को ‘निर्धारित समय सीमा के भीतर निस्तारित’ दिखाकर अपनी पीठ थपथपाई जाती है, उनकी असलियत कुछ और ही है। असल में इन त्वरित निस्तारित मामलों में से अधिकांश का फैसला उपभोक्ता के पक्ष में या मामले के गुण-दोष (मेरिट) के आधार पर नहीं हुआ होता, बल्कि उन्हें तकनीकी और प्रक्रियात्मक आधारों पर फाइलों से हटा दिया जाता है। उदाहरण के लिए, जनवरी के जिन 5 मामलों को समय सीमा के भीतर बंद दिखाया गया, उनमें से 2 केस एक महीने के भीतर ही वापस ले लिए गए थे और 2 निरस्त हुए थे। इसी तरह अप्रैल में निपटाए गए दिखाए गए 4 मामलों में से 2 मामले एक सप्ताह के भीतर वापस ले लिए गए और दो मामलों को महज कुछ ही दिनों के भीतर पैरवी न होने या तकनीकी कारणों से निरस्त कर दिया गया था। यह प्रवृत्ति स्पष्ट करती है कि कागजी आंकड़ों को दुरुस्त करने की होड़ में वास्तविक न्याय कहीं पीछे छूट जाता है।



