वोटर लिस्ट में ‘सिस्टम की सेंधमारी’? फार्म-7 के खेल पर कानूनी शिकंजा कसने की तैयारी
अज़हर मलिक
उत्तराखंड एस.आई.आर. 2026 के तहत मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण अभियान में बड़ा मोड़ आ गया है। प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर फार्म-7 के ज़रिए नाम कटवाने के नाम पर बड़े पैमाने पर बेनामी और फर्जी आपत्तियों का जाल बिछाया गया है। लोकतंत्र के इस मूल अधिकार पर हो रहे प्रहार को देखते हुए काशीपुर के प्रमुख समाजसेवी, सूचना अधिकार कार्यकर्ता और 45 कानूनी किताबों के लेखक नदीम एडवोकेट ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने मुख्य चुनाव अधिकारी को सीधी चुनौती भरा शिकायत पत्र और कानूनी खाका सौंपते हुए साफ कर दिया है कि बेनामी फर्जीवाड़े के दम पर किसी भी वैध नागरिक का मताधिकार नहीं छीना जा सकता।
अधिकारियों को भेजे गए अपने कड़े विश्लेषण में नदीम एडवोकेट ने सर्वाधिक प्रभावित सीटों के फार्म-10 के आंकड़े पेश कर बेनकाब किया है कि कैसे कुछ खास नामों और गुटों द्वारा 5 से अधिक फर्जी आपत्तियां लगाकर प्रशासनिक तंत्र का समय बर्बाद किया जा रहा है। उन्होंने निर्वाचन पंजीयन नियम 1960 के नियम 13 का हवाला देते हुए मांग रखी है कि आपत्तिकर्ता जब तक संबंधित विधानसभा का प्रमाणित वोटर साबित न हो, उसकी अर्जी सीधे खारिज हो। फर्जी डिजिटल हस्ताक्षरों और दूसरे के नाम पर जमा ऑनलाइन/ऑफलाइन अर्जियों की जांच बी.एल.ओ. और पर्यवेक्षण अधिकारी घर-घर जाकर करें। जिसकी पुष्टि न हो, उसे नियम 17 के तहत तुरंत कूड़ेदान में डाला जाए।
कानूनी दांव-पेच से बेपरवाह फर्जीवाड़ा करने वालों के लिए यह मामला अब भारी पड़ने वाला है। इस शिकायत पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि फार्म-7 में झूठा हलफनामा देना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 के तहत एक साल तक की जेल का सीधा रास्ता है। वहीं ऑनलाइन पहचान चुराकर और फर्जी भेष बदलकर धांधली करने वालों के खिलाफ आई.टी. एक्ट (धारा 66सी व 66डी) और भारतीय न्याय संहिता की संगीन धाराओं—जैसे आपराधिक षडयंत्र (धारा 61), लोक सेवक को भ्रामक सूचना देना (धारा 217) और फर्जी साक्ष्य गढ़ना (धारा 229-2)—के तहत एफ.आई.आर. दर्ज करने की पुरजोर मांग की गई है। फर्जी हस्ताक्षर से ऑफलाइन फॉर्म जमा करने वालों को कूटरचना (धारा 336-4) का आरोपी बनाकर जेल भेजने की सख्त हिदायत दी गई है।



